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पलुस्कर : हिंदुस्तानी संगीत के सागर


वह दृष्टिहीन कलाकार, जिसकी जिद, जुनून और लगन से आज शास्त्रीय संगीत दुनिया भर में प्रतिष्ठित है और उनके बनाये रास्ते पर चलकर अनेक कलाकार आज नाम,काम,दाम, तीनों कमा रहे हैं

निराला बिदेसिया


दुनिया में भारत की पहचान की रेखाओं को रेखांकित करें या फिर भारत की ओर से दुनिया को देन की फेहरिश्त तैयार करें, भारतीय संगीत दोनों ही खाके में अनिवार्य रूप से शामिल होगा. वजह भी वाजिब है. आज दुनिया भर में भारतीय संगीत के प्रति दिवानगी है. न जाने कहां-कहां से लोग भारतीय संगीत सीखने-जानने-समझने अपने देश आ रहे हैं. न जाने कितने मुल्कों में भारत के अनेकों कलाकार रहकर काम,नाम और दाम, तीनों हासिल कर रहे हैं. लेकिन यह जो स्थिति आज है या कि पिछले करीब एक सदी से भारतीय संगीत का इतिहास सिर्फ स्वर्णीम ही स्वर्णीम दिखता है, वह सब इतनी आसानी से हासिल नहीं हुआ था. इसे हासिल करने के लिए एक संगीतकार-कलाकार ने अपना पूरा जीवन ही इसी में लगा दिया था. उसी कलाकार के जिद, जुनून, लगन और समर्पण की ही कीमत पर आज भारतीय शास्त्रीय संगीत इतने बड़े फलक पर विस्तारित दिखता है और प्रतिष्ठित पेशा भी. उस कलाकार का नाम था विष्णु दिगंबर पलुस्कर. आज उसी कलाकार का जन्मदिन है. आगे पलुस्कर की कहानी को जानें, इसके पहले यह जान लें कि उन्होंने भारतीय संगीत के लिए यह सब काम नेत्रहीन होकर किया था और स्कूली शिक्षा महज चैथी कक्षा तक थी.


पलुस्कर की कहानी यह है कि उनका जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरूंदवाड़ में हुआ. उनके पिता दिगंबर पंडित कीर्तनिया गायक थे. पलुस्कर अभी बच्चा ही थे कि अतिशबाजी में उनकी आंखों की रोशनी चली गयी. आगे पढ़ना-लिखना मुश्किल हो गया. पिता ने नेत्रहीन बेटे को संगीत की शिक्षा के लिए मिरज में पंडित बालकृष्ण बुवा इचलकरंजीकर के पास भेज दिया. पलुस्कर वहां पहुंचे तो फिर 12 साल वहीं रह गये. कहावत और मुहावरे की तरह जो बात बतायी जाती है कि पहले पढ़नेवाले लड़के अपनी चोटी को रस्सी से बांध लेते थे ताकि उन्हें नींद न आये तो पलुस्कर सच में ऐसा करते थे. वे पूरी-पूरी रात चुटिया को रस्सी से बांध तानपुरे पर रियाज करते.


पलुस्कर जब अपने गुरू के पास से शिक्षित होकर निकले तो उस समय के चलन के हिसाब से रजवाड़ों के पास पहुंचे ताकि उनकी कला का मान मिले,प्रदर्शन का मौका मिले,जीवन का गुजारा हो. तब संगीत या तो राजे-रजवाड़ों की कृपा पर उनके महलों तक सीमित थी या फिर दूसरा ठीकाना तवायफों का कोठा था.

पलुस्कर संगीत के बड़े संरक्षक मानेजानेवाले ग्वालियर और बड़ौदा के रजवाड़े के पास पहुंचे. लेकिन रजवाड़ों के यहां जाने के बाद भी मदद मांगने को उनका मन नहीं जमा. उन्होंने पब्लिक कंसर्ट करने का निर्णय लिया. यह असाधारण निर्णय था. एक नयी राह बनाने की शुरुआत थी.


उस वक्त शास्त्रीय संगीत का आमलोगों के बीच, आमलोगों के सहयोग से प्रदर्शन का कहीं कोई चलन नहीं था. उन्होंने पहला शो सौराष्ट्र यानि अब के गुजरात में किया और उसके बाद वे अपने राज्य महाराष्ट्र लौट आये. गांव-गांव घूमने लगे. जहां भी जाते, एक संगीतकार व कलाकार होने के नाते हेय दृष्टि से देखा जाता. उच्च घरानेवाले तो उबकाई भरे नजरिये से देखते. सिर्फ पलुस्कर को नहीं बल्कि संगीतकारों और कलाकारों को ही समाज उपेक्षित नजर से देखता. जिन कलाकारों को रजवाड़ों का संरक्षण नहीं मिलता या फिर तवायफें अपने कोठे पर जगह नहीं देती, उनका जीवन गुजारना भी मुश्किल था. पलुस्कर घबराये नहीं. आंखों में बिना रोशनी के गांव-गांव घूमने लगे. संकल्प लिये कि वे जब तक भारतीय संगीत को, संगीतकारों को, कलाकारों को आमजनमानस से जोड़ेंगे नहीं, उनके बीच स्थापित और प्रतिष्ठित नहीं करेंगे, तब तक घूमते रहेंगे.


इसके लिए उन्होंने गीतों में बदलाव शुरू किया. जो प्रेम और श्रृंगार के गीत थे, उससे भद्दे शब्द हटाकर भक्तिभाव को जोड़ने लगे. लोगों की रुचि जगी. पलुस्कर का प्रयोग सफल हुआ.लोग जुड़ते चले गये. अभियान रंग लाने लगा. उनका मनोबल बढ़ा. वे 1901 में लाहौर पहुंच गये. उन्होंने वहां गंधर्व महाविद्यालय खोल दिया. यह उनका साहस और आत्मविश्वास ही था कि बिना पैसा यह कदम उन्होंने वहां उठा लिया कि लोग अपने बच्चों को संगीत पढ़ने को जरूर भेजेंगे. तमाम मुश्किलें और चुनौतियां आती रहीं लेकिन पलुस्कर लाहौर में डंटे रहे. इस बीच उनके पिता की मृत्यु की सूचना भी पहुंची लेकिन वे इतने मगन थे कि उसी में लगे रहे. 1908 में पलुस्कर मुंबई आ गये. यहां भी उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय की शाखा शुरू कर दी.


पलुस्कर तब तक महाराष्ट्र के आम जनमानस मंे संगीत को बिठा चुके थे. मुंबई में ज्यादा बच्चे पढ़ने आने लगे. पलुस्कर का मन बढ़ा तो वे गंधर्व महाविद्यालय को बड़ा करने को सोचने लगे, ताकि अधिक बच्चे आये. पलुस्कर ने स्कूल को विस्तारित करने के लिए लोन लिया. खुद दिन रात एक कर ज्यादा से ज्यादा कंसर्ट करने लगे. लेकिन 1924 मंे वह समय भी आया, जब पलुस्कर लोन नहीं चुका सके, वे कहीं बाहर कंसर्ट करने गये थे, लोन देनेवाले ने स्कूल की बिल्डिंग को निलाम कर दिया.


इतने के बाद पलुस्कर की जगह कोई और होता तो टूट-बिखर जाता लेकिन वे लगे रहे. तब तक वे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ चुके थे. गांधीजी, लाला लाजपत राय, मालवीयजी आदि के संपर्क में आ चुके थे. गांधी के प्रिय बन चुके थे. रघुपति राघव राजाराम, जो गांधी का सबसे प्रिय भजन था, उसके पहले कंपोजर और पहले मौलिक गायक कलाकार पलुस्कर ही थे. और फिर बंदे मातरम आज जिस मौलिक धुन में बजता है, सुना जाता है, उसे कंपोज करनेवाले भी वही कलाकार थे. कांग्रेस की सभाओं में सबसे पहले पलुस्कर के बंदेमातरम का ही गायन होने लगा. नेत्रहीन होकर भी वे संगीत की किताबें रचते रहे. 50 के करीब किताबें संगीत पर उन्होंने रची. खास यह कि वह उसी दौर में संगीत को सिर्फ राजे-रजवाड़े से ही मुक्त नहीं करा रहे थे बल्कि महिला कलाकारों के लिए संभावनाओं की राह बनाने की कोशिश भी शुरू कर दिये थे. उन्होंने महिला संगीत के लिए अलग से किताब लिखी. और यह सब करते हुए पलुस्कर ने भारतीय संगीत को पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विनायक राव पटवर्धन, प्रो.बीआर देवधर, पंडित नारायण राव व्यास, पंडित वामन राव पाध्ये जैसे उम्दा और कालजयी कलाकारों को अपने शिष्यत्व में विकसित कर दिया.


पलुस्कर के जन्मदिन पर यह आलेख सत्याग्रह में प्रकाशित हुआ था.

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