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विवाह के बाद शारदा सिन्हा ससुराल इलाके में गयीं कंसर्ट करने, नारा-जयकारा लगा, जगदंबा माई की जय

शारदा​ सिन्हा से किश्तों में कई बार मन भर बतकही हुई है. उन्हीं बतकहियों में से विवाह वाले हिस्से का आज पुनर्पाठ हो रहा,उन्हीं के शब्दों में, क्योंकि आज उनकी शादी की 50वीं सालगिरह है.

बात 1970 की है. मेरी शादी हुई. मेरी विदाई होने लगी. मेरे संगीत के गुरुजी रामचंद्र झा समेत कई लोग, सभी परिजन विदाई के वक्त मौजूद थे. विदा होने से पहले मेरे पिताजी ने घर के अंदर मौजूद सभी पुरुष सदस्यों को ओसारे में चलने के लिए कहा. मेरे पति को भी पिताजी ने कहा कि मेहमान आप भी कुछ देर बाहर बैठें. उसके बाद उन्होंने धीरे से कहा कि जा ही रही हो शारदा तो एक टा गीत सुनाती जाओ. मैं बैठ गयी. पिताजी के दो मनपसंद गीत गाने लगी. पहले सुनायी- घूंघट नैना नाचे, पनघट-पनघटन नैना, लहर-लहर नइया नाचे, नइया में खेवइया... और दूसरा गीत था- निमिया तले डोला रख दे मुसाफिर... मैं गा नहीं पा रही थी, खुद को संभाल नहीं पा रही थी. पिताजी ने गले से लगा लिया. वहां मौजूद सारे लोग रो रहे थे. ऐसे ही माहौल में मैं अपने पिता के घर से विदा हुई. बात 1971 की है. तब मैं संगीत से प्रभाकर की पढ़ाई कर रही थी. मणिपुरी नृत्य का प्रशिक्षण भी ले रही थी. तब हमउम्र साथी मिलकर दिन-रात गाना गाने की जुगत में लगे रहते थे. अखबार में एक इश्तेहार आया कि लखनउ में टैलेंट सर्च चल रहा है. मैंने अपने पति बीके सिन्हा से बात की तो वे चलने को तैयार हो गये. पैसे हमारे पास पर्याप्त थे नहीं फिर भी हम लखनउ के लिए निकल गये. वहां ट्रेन से उतरकर सीधे एचएमवी कंपनी के आडिशन सेंटर पर पहुंचे. काफी भींड़ थी. जहीर अहमद रिकाॅर्डिंग इंचार्ज थे जबकि मुकेश साहब के रामायण एलबम में संगीत देनेवाले मुरली मनोहर स्वरूप संगीत निर्देशक. नेक्स्ट-नेक्स्ट कर प्रतिभागियों को बुलाया जा रहा था. आखिरी में मैं पहुंची और जाकर बोली कि गाना गाउंगी. जहीर अहमद ने मेरी आवाज में यह एक वाक्य सुनते ही कहा कि नहीं जाओ, तेरी आवाज ठीक नहीं है. एक सिरे से खारिज कर दी गयी. समस्तीपुर से भागे-भागे लखनउ पहुंची थी मैं, बेहद निराश हो गयी. सोच ली कि जब रिजेक्ट ही कर दी गयी मेरी आवाज तो अब कभी नहीं गाउंगी. उस रोज लखनउ, अमीनाबाद पहुंचकर जितना कुल्फी खा सकती थी, खायी. मैं अपने आवाज को एकदम से बिगाड़ देने की जिद के साथ कुल्फी खाये जा रही थी कि अब तो गाना ही नहीं है.


रात में हम एक होटल में रूके. बीके सिन्हा ने कहा कि एक बार और बात करेंगे, ऐसे कैसे लौट कर चले जायेंगे. खैर! तय हुआ कि सुबह चलेंगे मिलने.अगली सुबह हम फिर बर्लिंगटन होटल के कमरा नंबर 11 में बने एचएमवी के टेंपररी स्टूडियो में पहुंचे. इस बार मेरे पति बीके सिन्हा ने संगीत निर्देशक मुरली मनोहर स्वरूप से अनुरोध किया कि मेरी पत्नी गाना गाती हैं, पांच मिनट का समय दे दीजिए. मुरली मनोहर जी तैयार हो गये. माइक पर पहुंची तो ढोलक पर संगत कर रहे अजीम ने मजाक करते हुए कहा कि शारदा कल तो चल नहीं पायी थी, आज शुरू करने से पहले जरा दस पैसा माइक पर चढ़ा दो ताकि नेग बन जाये. सामने देखी तो आडिशन लेने के लिए कोई महिला बैठी हुई थी. मैं क्या गाउं, यह तय नहीं कर पा रही थी. लोक संगीत के नाम पर मुझे दो गीत याद थे, जो अपनी भौजाई से सीखी थी अपने दूसरे भाई की शादी में गाने के लिए. एक द्वार छेंकाई का गीत सीखी थी ताकि भाई के शादी में द्वार छेंकूंगी तो कुछ पैसे मिलेंगे और दूसरा गीत कन्यादान का था. मैं वही गीत गाना शुरू की- द्वार के छेंकाई नेग पहिले तू दिहअ ए दुलरूआ भइया, तब जइहो कोहबर पर...


जब मैं इस गीत को गा रही थी, तब तक एचएमवी के जीएम केके दुबे भी वहां पहुंच चुके थे. गीत खत्म होते ही केके दुबे ने कहा- मस्ट रिकाॅर्ड दिस आर्टिस्ट. और वह महिला जो, आडिशन जज के रूप में बैठी हुई थी, पास बुलाकर सर पर हाथ फेरते हुए बोली- बहुत आगे जाओगी, बस रियाज किया करो. मुझे बाद में पता चला कि वह महिला कोई और नहीं बल्कि बेगम अख्तर थीं, जिनकी आज मैं सबसे बड़ी फैन हूं. मेरे गीत रिकाॅर्ड हो गये. शादी के बाद एक जीवन का यादगार प्रोग्राम हुआ. मेरी शादी बेगुसराय जिले के सिहमा गांव में हुई. इस नाते मैं बेगुसराय वाले मुझे बहुरिया कहते हैं. वर्षों पहले की बात है. इलाके के कुछ नामी-गिरामी बदनाम-कुख्यात लोगों ने मिलकर एक धार्मिक यज्ञ का आयोजन किया. इलाके में यही हल्ला था कि वे लोग अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं. तब बात आयी कि इस यज्ञ की पूर्णाहुति कैसे हो? अधिकतर लोगों ने कहा कि- आपन पतोह छतीन शारदा सिन्हा, उन्हीं से. मुझे यज्ञ के आखिरी दिन बेगुसराय में बुलाया गया. मैं समस्तीपुर से चली तो बछवारा से बेगुसराय तक सड़क के दोनों ओर लोग जमे हुए थे. स्वागत में.


लोगों ने बताया कि कम से कम पांच लाख लोग तो थे ही. दूर-दूर तक लगे माइक से गीत सुनने के लिए. मैंने अपने जीवन में कभी एक कलाकार को सुनने के लिए उस तरही की भीड़ कभी नहीं देखी. वह प्यार, वह धैर्य और उतनी बड़ी भीड़ में बहू का मान-सम्मान रखने के लिए अनुशासन बनाये रखना, कभी नहीं भूल सकती. जगदंबा घर में दियरा बार अईनी हे...गीत काफी मशहूर हो चुका था. सड़क किनारे लोग एक ही नारा लगा रहे थे- जगदंबा माई की जय.

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