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लिट्टी के ढलान और सत्तू के चढ़ान का लोकविज्ञान

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करीब चार माह पहले की बात है. नवंबर के आखिरी में. हाड़तोड़ ठंड का मौसम था. बक्सर में पूरे पुरबिया इलाके के लोग जुटे थे. यह जुटान हुआ तो था पंचक्रोशी यात्रा या पंचक्रोशी मेले के लिए लेकिन जिससे पूछते वह कहता कि लि​ट्टी चोखा मेला चल रहा है. पंचक्रोशी यात्राएं तो और जगहों पर होती हैं लेकिन खानपान का जो कनेक्शन बक्सरवाले का है या कि जिस तरह से यह लिट्टी चोखा का पर्याय हो गया है, वह दूसरी जगह नहीं दिखता. ​मिथकीय कहन यह है कि भगवान राम यहां जब आये थे, अपने गुरू विश्वामित्र का यज्ञ पूरा करवाकर यात्रा किये थे तो खुद ही लिट्टी चोखा बनाकर खाये थे. उसी याद में, यहां जो श्रद्धालु आते हैं,वे लिट्टी—चोखा बनाकर खाते हैं. जाड़ा में लिट्टी चोखा का पर्व खत्म हो गया है तो अब गर्मी की शुरुआत के ठीक पहले सत्तू वाला पर्व आनेवाला है. अप्रैल के मध्य में. 14 अप्रैल को. सतुआन का पर्व.


हालांकि यह 14 अप्रैल को अकेला पर्व सतुआन ही नहीं होता. उसी दिन बिहार के ही एक हिस्से मिथिला में जुड़-शीतल मनाया जाता है. बंगाली समुदाय के लोग पयला बैशाख मनाते हैं. दक्षिणवाले विशु नववर्ष मनाते हैं. बात फिलहाल सतुआन की.



कड़कड़ाती ठंड में लिट्टी—चोखा का पर्व और गर्मी की आहट आते ही सतुआन का पर्व, इन दोनों के बीच जो गैप है, वह बड़ा रोचक है.लोकविज्ञान का अनोखा फार्मूला है इसमें. भले लिट्टी चोखा बिहार का सदाबहार ब्रांड फूड आइटम हो लेकिन उसे बिहारी या पुरबिया समाज के लोग जाड़ा में ही खाते हैं. गर्मी में उससे परहेज ही करते हैं. जबकि उसका जो मेन आइटम यानी सत्तू होता है, उसकी धाक गर्मी में ही रहती है.


जाड़ा और गर्मी में लिट्टी चोखा और सत्तू का क्या महत्व या शरीर के अनुसार समीकरण रहा है, उसे खानपान के विशेषज्ञ मानेजानेवाले महात्मा गांधी ने अपनी डायरी में एक प्रसंग में लिखा है. 13 जून 1917 को बेतिया में अपनी डायरी में महात्मा गांधी लिखते हैं ( पत्रकार अरविंद मोहन द्वारा संपादित मि. एमके गांधी की डायरी) कि बेतिया पहुंचते ही हम एक अजीब सकंट में फंसे थे. राजकुमार शुक्ल उल्टी—दस्त के शिकार हो गये. अनुमान है कि गर्मी के दिन में लिट्टी खाने की वजह से यह परेशानी हुई. बैंगन जैसी किसी सब्जी को आग पर भूनकर उसका भर्ता और उपले की उसी बुझती आग पर आटे की गोली में मसाला डाला हुआ सत्तू भरकर भून लिया जाता है. इसे बनाने में बर्तन का झंझट नहीं रहता, स्वादिष्ट भी लगता है और पौष्टिक भी होता है लेकिन मसाले वगैरह के कारण इसमें गर्मी होती है. जाड़े में लोग चना, जौ, मटर, वगैरह का सत्तू खूब खाते हैं. यह ठंडा रहता है, पेट को ठंडा रखता है.गांधी को तब जाड़ा में लगायेजानेवाले लिट्टी चोखा पर्व और गरमी में मनाये जानेवाले सत्तू के पर्व के बारे में जानकारी होती तो वह भी जरूर लिखते, क्योंकि खानपान पर गांधी छोटी से छोटी जानकारी लेते भी थे और लिखते थे. उन्होंने तो अपने लिखने की शुरुआत ही खानपान पर लिखने से की थी.

खैर! यहां बात फिर से सत्तू और सतुआन की.


सतुआन एक पर्व की तरह अब सामने है. इसके दान—पुण्य आदि के भी कनेक्शन हैं. सतुआन के यह दान भी होगा, लेकिन दान से ज्यादा महत्व इस बात का होगा कि उस दिन पहले पहर में लोग सत्तू ही खाते हैं. आम के टिकोरे के साथ, गुड़ के साथ. और भी अपने तरीके से. उस दिन से सत्तू का बाइप्रोडक्ट लिट्टी चोखा पूरी गर्मी एक तरीके से नेपथ्य में चला जाता है और मूल सत्तू जलवा में आ जाता है. पूरी गर्मी सत्तू का इस्तेमाल पुरबिया इलाका अनेक तरीके से करता है. रोजाना सत्तू पीना तो शामिल हो ही जाता है. नमकीन भी, मिठा भी. सत्तू के लड्डू बनाने का चलन भी इन दिनों खूब बढ़ा है. सत्तू का लड्डू कोई अलग तरीके से नहीं बनता बल्कि जैसे बेसन का बनता है, ठीक वैसे ही बनता है. फर्क यह होता है कि बेसन का लड्डू बनाकर कुछ ज्यादा दिनों तक रख सकते हैं, सत्तू का लड्डू उतने दिनों तक इंतजार नहीं करवा सकता. बनाइये तो सप्ताह दिन के अंदर खाइये.


बाकि तो शास्त्रीय विधि में जाने पर सत्तू का लंबा इतिहास मिलेगा कि यह कैसे संस्कृत के सक्तू शब्द से आया है और चलन में सत्तू बन गया. फिर इसकी लंबी कहानी होगी. बिहार में तो सत्तू की कहानी हर इलाके में है. राजनीति से जुड़ी कहानियां भी कोई कम नहीं. रोचक कहानी तो कोरियावाली ग्रेस ली की भी है, जो एक समय में अपने पति के इलाज के लिए बिहार सत्तू लेने आयी थी और बिहार में ही वह सत्तू की बड़ी कारोबारी बन गयी. अगर सत्तू पर कहानियां हैं, गीत हैं, कविताएं हैं. एक कविता उपेंद्र कुमार की है. उसका अंश हैं—


पूरब में सबसे सहज, सबसे लुभावना

कैसेट का गाना और सत्तू का खाना...

ताजा पीसे सत्तू की सोंधी खूश्बू

कभी कैद हो सकती है क्या

किसी पोटली या एयर बैग में.

सत्तू को, केवल सत्तू समझनेवालों के लिए

जरूरी है जानना

कि सत्तू का भी अपना एक इ​तिहास है

गौरवशाली और महान

मगध साम्राज्य जैसा...

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