• Nirala Bidesia

रामरुच: पहुना राम को खाने में रुचि जगानेवाली सब्जी



निराला बिदेसिया

हुआ ऐसा था कि रामजी तो विवाह करने मिथिला आ गये. अब मिथिला में विवाह के बाद तो दुलहा को ससुराल में रूकने की भी परंपरा रही है. रामजी के विवाह से नहीं, बल्कि उनके पहले से. तो,रामजी रुके अपने ससुराल में.ससुराल में रूकें तो उन्हें तरह-तरह का  खान-पान-पकवान परोसा जाने लगा. नित नवीन व्यंजन, पर रामजी को खाने की रुचि ही नहीं जग रही थी.एक—एक कर आइटम पर आइटम बदले जाते रहे लेकिन पहुना खाना ही न खायें.


फिर एक दिन बेसन की सब्जी दी गयी. रामजी उसे खाने लगे. खूब चााव से. भन मन, भर पेट खाये. उसे खाने से रामजी के खाने में रुचि जग गयी. बाद में तो पहुना रामजी मिथिला के सभी व्यंजनों को मन से खाने लगे. तो, बात बस इतनी सी है कि जिस बेसन की सब्जी की वजह से पहुना रामजी की खाने में रुचि जगी या खाने की रुचि जगी, मिथिलावाले ने उसका नाम रामरुच कर दिया.


मिथिला के इलाके में जाने पर किसी भोज में रामरुच खिलाया जाता है तो गैर मिथिलावासियों को यह मिथिलावाले यह कथा खाते—खाते जरूर सुनाते हैं.गर्व से सब्जी का बखान करते हैं. अब यह कथा कहीं लिखित दस्तावेज तो है नहीं. लोकमानस में रची-बसी कहानी है, तो कहीं-कहीं इसमें बदलाव हो जाता है. बदलाव के साथ यह कहा जाता है कि राम के सामने ससुराल जनकपुर में 56 प्रकार के व्यंजन परोसे गये थे लेकिन राम की रुचि बेसनवाली सब्जी में ही जगी थी कि इसलिए इसका नाम रामरुच पड़ा.


कहानियां दोनों एक जैसी ही हैं, सिर्फ थोड़ा हेर-फेर है. अब राम को यह खाना परोसा गया था या नहीं, इसका प्रमाण दस्तावेजों में तलाशने में उर्जा लगाने या उसके जरिये कुतर्क की जरूरत नहीं. उसकी बजाय यह जानना दिलचस्प है कि मिथिलावाले पारंपरिक रूप में राम को उस तरह से भाव तो नहीं देते, जैसे उत्तरभारत के दूसरे इलाके में दिया जाता है. उसके पीछे सीता के साथ अंतिम समय में उनका व्यवहार रहा था.


राम को भले ही मिथिलावाले भाव नहीं देते लेकिन अपने पहुना राम से उनका रागात्मक लगाव है और वह राग वहां के खानपान में तलाश सकते हैं. जैसे रामरुच की बात हुई कि उसका नाम राम के नाम पर पड़ा. वैसे ही वहां की एक मिठाई भी बहुत मशहूर है, जिसे रामभोग कहते हैं. यह मिठाई भी मिथिला में घर-घर में बनता है और मजेदार यह कि यह भी दूध के साथ बेसन मिलाकर ही बनाया जाता है. मिथिला के इलाके में खानपान के सिर्फ इन दो चीजों का नाम ही राम के नाम पर नहीं बल्कि एक लंबी फेहरिश्त है.


मिथिलावाले कहते हैं कि पहुना राम को खाने में जो-जो परोसा गया था, उन सबका नाम राम के नाम पर हमारे पुरखों ने कर दिया था. फिर वही नाम लोकपरंपरा में चलने भी लगा और मिथिला से निकलकर दूसरे इलाके में भी वही नाम मशहूर होता गया. जैसे झिंगी को रामझुमनी, नमक को रामरस, भिंडी को रामतोरोई आदि-आदि, वगैरह-वगैरह.



राम के नाम पर सिर्फ रामरुच या रामभोग नहीं बल्कि अनेकानेक खानपान की चीेजें मिथिला में मशहूर है लेकिन रामरुच की लोकप्रियता सबसे ज्यादा है. यह आज भी भोज-भात में बनता है. मांसाहार के विकल्प के रूप में, विशेषकर मटन के विकल्प के रूप में शाकाहारियों को परोसा जाता है. वजह यह कि इसे बनाने मे भी लगभग वही प्रक्रिया है, जो मटन की होती है. मतलब लगभग वही मसाले, स्वाद भी लगभग उसी तरह का. विस्तार से पूछिए कि कैसे बनता है तो जैसे आप बेसन की सब्जी बनाते हैं, उसी तरह बनाकर खाइये. खाते समय, बनाते समय इसका नाम रामरुच कर के देखिए. लगेगा कि कोई खास चीज खा रहे हैं.यूं भी स्वाद व्याख्या की चीज नहीं, निजी और व्यक्तिगत स्तर पर महसूसने की चीज है.   

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