• Nirala Bidesia

युद्धरत कुंवर: प्रेमरत कुंवर

कुंवर सिंह की आज जयंती है. उनका जब भी कोई खास दिन आता है, शिद्दत से धरमन को याद करता हूं. कुंवर सिंह की धरमन जान को. इतिहास के पन्नों में भी ऐसे कम ही प्रेम दर्ज हैं.दुर्भाग्य यह कि धरमन का प्रेम और समर्पण इतिहास के पन्नों में भी जगह नहीं पा सका. तब कितनी नफरत रही होगी न लिखनेवालों के मन में धरमन के प्रति. कितना हीन भाव रहा होगा न धरमन को लेकर, तभी तो कुंवर सिंह लगातार नायक के रूप में स्थापित हो गये और उनके संग परछाईं की तरह रही धरमन कहीं फुटनोट्स में भी जगह न पा सकी.

"Kunwar Singh, 'The Rebel of Arrah,' and his attendants". Image via Illustrated London News


तब कितनी नफरत रही होगी, यह सिर्फ कल्पना कर सकता हूं, 15 साल पहले अपने पुराने दिनों में लौटकर. 2015 में आरा गया था, उस दिन को याद करते हुए. आरा आनाजाना तो बचपने से रहा है लेकिन उस वक्त धरमन पर रिपोर्ट करने गया था. कई जगहों पर भटके, कोई कुछ बताने को तैयार नहीं. कुछ ने तो भरमुंह बात तक नहीं की. वे कुंवर पर बात करने को तैयार थे, धरमन पर नहीं. कोई विद्वान रखैलन की परिधि में समेट दे,कोई सामान्य पतुरिया कह के बात बदल दे. सब यह सुनाने को ज्यादा बेचैन थे कि कुँवर सिंह,वैसे थे. उनका मंत्रिमंडल बहुत सेकुलर था. महाराजा रणजीत सिंह की तरह कूटनीतिक मंत्रिमंडल. आदि-इत्यादि न जाने कितनी बात दुहराते थे. फलाना-ढिमकाना. वे ऐसी बात करते तो यह कहकर मैं भी उसे समाप्त करता कि किताबें मैं भी पढ़ता हूं. किताबों का पाठ सुनने आरा नहीं आया बल्कि जो किताबों में दर्ज नहीं, वह बताये. धरमन के बारे में बताये.

ऐसा न था कि जानते न थे. सब जानते थे. लोकमानस में एक बार कैद हो गयी या रच बस गयी कहानियां निकलती कहाँ है दिमाग से? लिखंत चीजों से ज्यादा मजबूती से समाज मे मौजूद रहती हैं लोक स्मृति की चीजें. हिंदुओं की बात कौन करे, मुसलमान भी धरमन पर बात न करे. आरा के धरमन चौक पर धरमन ही अजनबी थी. करमन टोला में करमन अजनबी. अजीब था.

खैर, जो जानकारियां मिली, जो धरमन चौक पर महसूस कर सका, कुछ लोगों से बातचीत कर सका, उस आधार पर रिपोर्ट लिखा. अखबार ने छापने से मना कर दिया कि यह विवादित प्रेम है. इसे नही छापा जा सकता. विवाद होगा. धरमन के बारे में कहीं कोई इतिहास नही. यह अपने लिए वज्रपात की तरह था. पांच दिन आरा में रहकर लौटने के बाद इनकार सुनना.

कुंवर सिंह द्वारा अपने ही समय में मस्जिद रूप में बनाये गये प्रेम निशानी का हवाला देना काम न आया, रश्मि भारद्वाज की किताब में कुंवर सिंह की धरमन से शादी और संतान होने की बात को रखना काम न आया. यह बताना भी काम न आ सका कि भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा 1857 के अमर सेनानी सीरिज में प्रकाशित पुस्तक वीर कुंवर सिंह में दर्ज किया जा सका है कि धरमन कुंवर सिंह की दूसरी पत्नी थीं. वह मुसलमान थीं जिन्हें लोग नन्हीं के नाम से जानते थे. उन्होंने अपनी सारी संपत्ति 1857 के संघर्ष में कुंवर सिंह को दे दी थी. यह पुस्तक रश्मि चौधरी ने अनुसंधान के बाद लिखा है. पुस्तक में कुंवर सिंह के प्रमुख सहयोगियों की जो सूची प्रकाशित की गयी है, उसमें धरमन का नाम प्रमुखता से दर्ज है. उसी किताब में कुंवर सिंह का जो जीवनवृत्त दिया गया है, उसमें भी यह स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि उन्होंने दो शादियां की. पहली पत्नी राजपूत परिवार की थी और दूसरी पत्नी नन्हीं थी, जो धरमन के नाम से मशहूर थीं. नन्हीं से कुंवर सिंह की दो संतानें हुईं-विंदेश्वरी प्रसाद सिंह और महावीर प्रसाद सिंह.


यह बताना भी काम न आ सका कि लोकमानस में यह कथा रची—बसी हुई है कि एक बार जब कुंवर सिंह को अंग्रेजों ने सार्वजनिक रूप से आयोजित मुजरे के कार्यक्रम में खिल्ली उड़ाने की कोशिश की, तभी से धरमन का स्नेह कुंवर सिंह से बढ़ा. कुंवर सिंह को प्रेम हुआ, बाद में वह सहयोगी और जीवनसंगिनी बनीं.


अंत मे अपने वेबसाइट बिदेसिया पर लगाया. 2010 में जैसे ही तहलका से जुड़ा दूसरे अंक में ही फिर से धरमन की स्टोरी को प्रोपोज़ किया. तहलका ने छापा. फसाना जिसे बिसरा गया जमाना...बहुत दिनों बाद किसी इस एक रपट के छपने पर इतनी खुशी हुई कि बता नही सकता. धरमन की अनगिनत कहानियों को जानने में मेरी गहरी रुचि है. धरमन हमारे भोजपुर इलाके की अप्रतिम नायिका है. प्रेम, त्याग और वीरता-लड़ाकापन की नायिका. अब भी जब जब कुंवर सिंह को याद करने का दिन याद आता है मैं कुंवर सिंह के साथ धरमन को भी उतने ही शिद्दत से याद करता हूँ. धरमन के बिना कुंवर अधूरे लगते हैं. कुंवर भी चाहते थे कि लोग उन्हें याद रखे तो धरमन को भी याद रखे इसलिए अपने ही जीवन मे जब वे युद्ध लड़ रहे थे उसी वक़्त प्रेम की निशानियां भी तैयार करवा रहे थे.


वे जानते होंगे अपने भोजपुर इलाके के मन मिजाज को कि प्रेम इस इलाके के लिए विषय नही इसलिए वे अपने प्रेम,अपनी धरमन को खुद ही स्थापित कर रहे थे. कुंवर सिंह यह काम डंके की चोट पर कर रहे थे, उन्हें नायक मानने वाले दबी जुबान में भी नही कहते इसे. चुकी धरमन को याद करने का दिन अलग से तय नहीं किया गया है इसलिए कुंवर सिंह के हर खास दिन पर धरमन को याद करता हूँ. और जो भी अपने सिनेमा,नाटक वाले लोग हैं उनसे तो हमेशा कहता हूँ कि यह एक विषय है नाटक के लिए, सिनेमा के लिए. मुझे साहित्य रचने आता तो मैं उपन्यास लिखता कुंवर की धरमन पर.


और अंत में, कुंवर सिंह की जयंती पर विजयगान का आनंद लीजिए. द्वारिका तिवारी रचित गीत, चंदन तिवारी की आवाज में.


59 views

© niralabideia.com