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मेरे बुद्ध,तेरे बुद्ध,सबके अपने-अपने बुद्ध, गली-नली में बुद्ध ही बुद्ध !


मुरगहवा बुद्ध.बुद्ध की प्रतिमा पर मुरगा चढ़ाते भक्त.| तसवीर जितेंद्र पुष्प की

निराला बिदेसिया | 2014 में प्रकाशित रिपोर्ट


गया जिले में वजीरगंज एक पुराना और मशहूर बाजार है. उससे कुछ ही दूर आगे बढ़ने पर एक छोटा-सा कस्बा है केनार. केनार कभी कांसे के कारीगरों, कलाकारों और कारोबारियों के लिए बेहद मशहूर कस्बा हुआ करता था. बिहार के साथ देश के दूसरे हिस्से में भी. लेकिन अब केनार बदला हुआ है. वहां के कारीगर अपने ही हूनर के मजदूर बन गये हैं. दाने-दाने, पाई-पाई के मोहताज.


उसी केनार में हम कांसा बाजार के बहाने बच्चा बाबू का घर देखने गये थे. बच्चा बाबू यानि वीरेंद्र नारायण सिंह. 1937 में हुए एसेंबली चुनाव में बिहार में कांग्रेसी विधायक. उसके बाद भी लगातार कई बार विधायक रहे थे बच्चा बाबू. स्वभाव से विद्रोही, दिल से जनसरोकारी. कांग्रेस से थे, कांग्रेस को ही पानी पिलाये रखते थे.अपने दल की सरकार में सशक्त विपक्ष की भूमिका में. उसी केनार गांव से रहकर पूरे बिहार के साथ-साथ दिल्ली तक की राजनीति में तुती बोलवाते थे बच्चा बाबू. बच्चा बाबू वर्षों पहले स्वर्गीय हो चुके हैं.


उनके घर पर उनके बेटे भोला सिंह के इंतजार में हम बाहर ही टहल रहे होते हैं कि हमारी नजर सामने बड़े-पुराने बरगद के नीचे रखी हुई कुछ प्रतिमाओं पर पड़ती है. पास जाकर देखते हैं. बुद्ध की प्रतिमा. अनेक बुद्धों का समूह. सधी हुई, नक्काशीदार, खूबसूरत और प्राचीन भी. सामने भोला सिंह आते हैं. दूसरी बातें पूछने की बजाय सीधे उस बुद्ध प्रतिमा के बारे में ही पूछते हैं. कहते हैं. जमाने से है हमारे घर के बाहर यह. और भी प्रतिमाएं थी, अब यही बची है. कब से है, कैसे आयी, नहीं पता लेकिन यहीं है, इसी हाल में.


बात बदल जाती है. जिन बातों को करने गये थे, उस पर बात नहीं होती. बात बुद्ध पर ही केंद्रीत हो जाती है. भोला सिंह से हम पूछतेे हैं कि इतनी प्राचीन, इतनी खूबसूरत और पुरातात्विक दृष्टि से इतनी महत्वपूर्ण प्रतिमा घर के बाहर ऐसी ही पड़ी हुई है, इसे किसी संग्रहालय में क्यों नहीं भिजवा देते या फिर रख-रखाव का इंतजाम अच्छे से क्यों नहीं कर देते? उनका जवाब होता है- यह अच्छे तरीके से ही है, इस बाजार के दूसरे छोर पर भी कुछ बुद्ध हैं, जाकर देख लीजिए, मन का भ्रम दूर होगा.


भोला सिंह के घर से निकलकर हम केनार बाजार के दूसरे छोर पर जाते हैं. गांव के देवी स्थान पर. सामने बजबजाती हुई नाली की तरह पानी का बहाव और उसके एक तरफ लाइन से लगी हुई बुद्ध की कई प्राचीन प्रतिमाएं. एक श्रृंखला में. रूकते हैं. तसवीर उतारते हैं. कैमरा निकालते ही कुछ लोग घेर लेते हैं, क्यों ले रहे हैं देवी स्थान की तसवीर. हम कहते हैं- बुद्ध की तसवीर ले रहे हैं. वे कहते हैं, यहां आनेवाले बुद्ध को गायब कर देते हैं. हमारा सवाल होता है- बुद्ध को सिंदुर से पोत क्यों दिये हैं.


गांववाले बताते हैं- बुद्ध नहीं, गांव की देवी हैं ये. बुद्ध को बजबजाती नालियों के बीच देखने की तरह ही उन्हें देवी रूप में देखना भी आश्चर्यचकित करता है. हमारे साथ यात्रा में गये गया में रहनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता और समाजशास्त्री प्रभात शांडिल्य कहते हैं, आश्चर्यचकित होने की जरूरत नहीं! यहां तो सिर्फ बुद्ध देवी रूप में ही हैं, और आप तसवीर लेने आये हैं तो गांववालों द्वारा थोड़ी पूछताछ करने पर घबरा जा रहे हैं. दूसरी जगहों पर जाकर देखिए, बुद्ध किस-किस रूप में हैं कहीं बुद्ध को ग्राम देवता मान उन्हें खून की बली दी जाती है, कहीं वे तस्करों-चोरों की डर से बेड़ियों में कैद हैं तो कहीं उनके सिर ही गायब हैं लेकिन पूजा जारी है. हम ऐसी जानकारियों को जुटाते हैं. बोधगया, सारनाथ, वैशाली, राजगीर जैसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित बौद्ध स्थानों की बजाय गांव की गलियों में बुद्ध का जायजा लेने जाते हैं. बुद्ध इतने रूप में रंग दिये गये हैं, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती.


गया जिले के ही गुरूआ प्रखंड में एक गांव दुब्बा पहुचते हैं. दुब्बावालों ने बुद्ध की मूर्तियों को लोहे की बेड़ियों से जकड़ रखा है. ग्रामीणों का कहना है कि यह पहल मूर्ति तस्करों से रक्षा के लिए की गई है. दुब्बा देवी मंदिर के पुजारी सत्यनारायण पाण्डेय कहते हैं- मैं रोज पूजा करने आता हूं लेकिन आते ही सबसे पहले मूर्ति को देखता हूं कि वह है या नहीं, क्योंकि गांव से दर्जनों बुद्ध की मूर्तियां और बौद्ध स्तूप चोरी चली गई है. मंदिर में बुद्ध की जो आदमकद मूर्तियां स्थापित है उसे भी तस्करों ने उखाड़ तो लिया था लेकिन ज्यादा वजनी होने के कारण ले जाने में सफल नहीं हो सके और गांववालों को जब पता चला तो उन्हेांने तस्करों और चोरों से बुद्ध को बचाने के लिए देवी मंदिर के गर्भ गृह में बुद्ध की सभी मूर्तियों को लोहे के जंजीरों से मंदिर की दीवार में जकड़ दिया.


देवी मंदिर में दो ऐसी मूर्ति भी है जिसके गर्दन के नींचे का भाग बुद्ध का और मुखमंडल विकृत रूप में दिखता है. दुब्बा गांव के स्कूल परिसर में बौद्धकाल के कई स्तूप भी दिखते हैं. लेकिन स्कूल परिसर में बिखरे पड़े अवशेषों का इस्तेमाल हैरत में डालनेवाला होता है. बौद्ध काल के अर्द्धवृतिका पर महिलाएं मशाला पिसती है. स्कूल परिसर में ही इमामबाड़ा के पास रखे गये बौद्ध स्तूप और अर्द्धवृतिका का उपयोग यहां के लोग बैठने के लिए करते हैं. एक ग्रामीण लखन पाण्डेय ने कई बौद्ध स्तूपों को अपने दरवाजे की शोभा के लिए स्थापित कर रखा है लेकिन उनके बेटे और गांव के नौजवान उसका इस्तेमाल चबूतरे के तौर पर बैठने के लिए भी करने में संकोच नहीं करते. अब्बास मियां ने अपने नाली के पास बौद्ध स्तूप को इसलिए रख दिया है कि मिट्टी का कटाव नहीं हो.


मो.मुस्तफा के दरवाजे पर बौद्धकालिन अर्द्धवृतिका को बैठने के लिए स्थापित किया गया है. रामचंद्र शर्मा ने अनाज पीसने वाले मील में दो किलो से 20 किलो का बटखरा बौद्धकालिन पत्थर तोड़कर बनाया है. इस गांव के स्कूल में नहीं, प्रायः सभी घरों में बौद्धकालीन स्मृतियों से जुड़े पत्थरों का इस्तेमाल ऐसे होता है, जैसे वह पहाड़ से तोड़कर लाया गया कोई पत्थर हो. दुब्बा गांव से निकलकर हम भुरहा स्थान पहुंचते हैं. दुब्बा से महज दो सौ मीटर की दूरी पर अवस्थित है यह स्थान. यहां पिपल वृक्ष के नींचे भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में सिर कटी भव्य मूर्ति दिखती है. वृक्ष के चारो ओर टूूटी-फूटी बुद्ध की मूर्तियां और बौद्ध स्तूप का ढ़ेर लगा हुआ है. पास के शिव मंदिर के दिवारों में चारो ओर बुद्ध की मूतियों को चिपकाया गया है. वहां हमारी मुलाकात इलाके के समाजसेवी नरेश प्रसाद और सुमंत से होती है. वे बताते हैं- केवल दुब्बा, भुरहा में नहीं, पास के मंडा, नगमागढ़, भरौधा, पिरमा, नसेर, गुनेरी, तरोबा, मंगरावां, कुर्कीहार, पत्थरकट्ी, केनार सहित अन्य कई गांवों में बुद्ध और बौद्धकालीन अवशेष ऐसे ही हालत में हैं.


इतिहास के पन्ने भुरहा और दुब्बा की कहानी बयां करते हैं. बोधगया से सारनाथ जाने के क्रम में भगवान बुद्ध ने दुब्बा में पड़ाव डाले थे. इसका उल्लेख गया गजेटियर और मेजर किट्टो के सर्वेक्षण में मिलता है. गांववाले चाहते हैं कि बुद्ध और बौद्ध स्थलों के भरोसे बिहार के कायापलट की जो कहानी लिखी जा रही है, उस कड़ी और क्रम में दुब्बा-भुरहा की कहानी भी बदले लेकिन पुरातत्व विभाग वाले, सरकारी अधिकारी सिर्फ सांत्वना ही देते रहे हैं अब तक. नाउम्मीद गांववालों ने पिछले साल नयी पहल की. पुरातत्व विभाग और सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए 14 अप्रैल 2012 को स्थानीय लोगों के सहयोग से पहली बार भूरहा महोत्सव का आयोजन किया गया, लेकिन उसकी खनक और धमक उसी इलाके में दफन होकर रह गयी. बात पटना में बुद्ध को लेकर भविष्य की योजनाएं तैयार करने में लगे अधिकारियों तक नहीं पहुंच सकी.


इन गांवों को छोड़ हम बोधगया पहुंचते हैं. यह जानने कि क्या ऐसी स्थिति की जानकारी बोधगया में बैठे बुद्ध के बड़े पैरोकारों को है. बोधगया में चार दर्जन से अधिक देशी और विदेशी महाविहार है. सभी का उदे्श्य बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना है. परंतु गांव में बुद्ध और बौद्ध स्थलों की दशा-दुर्दशा से इनका ज्यादा वास्ता नहीं दिखता. महाबोधि मंदिर प्रबंधकारिणी समिति बोधगया के सचिव नंद जी दोरजी से बात होती है. वे कहते हैं- हमारी कमेटी केवल मंदिर की व्यवस्था देखती है. इंटरनेशनल बुद्धिष्ट काउंसिल बोधगया के सचिव किरण लामा का कहना है कि यह बोधगया स्थित देशी-विदेशी बौद्ध मंदिर और संस्थाओं का संगठन है. संगठन के माध्यम से होल्डींग टैक्स, बिजली दर की बढ.ोतरी सहित अन्य समस्याओं व सुख-सुविधाओं के लिए संघर्ष करती है.


इसी क्रम में हम महाबोधि मंदिर मुक्ति आंदोलन समिति के राष्ट्ीय महासचिव भंते आनंद से भी बात करते हैं. वे कहते हैं- बुद्ध को लोहे की बेड़ियों में जकड़ना, उसके स्तूप पर बैठना, बुद्ध के सिर कटी मूर्ति पर विकृत सर लगाना, हिंदू देवी देवताओं की तरह पूजा बुद्ध और पूरे विश्व के बौद्धों का अपमान है. वे आक्रोशित होते हैं. कहते हैं- भारत सरकार बौद्ध स्थलों और बौद्धो की उपेक्षा कर रही है. जो राष्ट्हीत में नहीं है. भारतीय पुरातत्व विभाग को ऐसे स्थलों का सर्वे कराकर विकास और बुद्ध से जूडें अवशेष को संरक्षित करना चाहिए. कई और बौद्धों से बात होती है. शिकायत सरकार पर आकर टिक जाती है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बुद्ध के नाम पर व्यवसाय करना चाहते हैं. उन्हें बुद्ध और बौद्धों की आस्था से कोई लेना देना नहीं है. पटना में करोड़ो की लागत से बुद्ध स्मृति पार्क बनाया गया है, परंतु जहां बुद्ध के अवशेष बिखरे हुए हैं उसका विकास तो दूर संरक्षण भी नहीं हो रहा है. भंते आनंत बोधगया में चल रहे बौद्ध महाविहारों पर भी गुस्सा दिखाते हैं. वे कहते हैं- इन्हें बौद्ध धर्म से कोई लेना-देना नहीं है.


ये सिर्फ बोधगया में बुद्ध के नाम पर अपना व्यवसाय कर रहे हैं. इनकी गतिविधियों की जांच होनी चाहिए. बोधगया की बात बोधगया में छोड़ हम देवी-देवता बने बुद्ध की तलाश में फिर निकलते हैं. तरह-तरह की जानकारियां मिलती हैं. बताया जाता है कि कहीं बुद्ध तेलिया मशान बाबा बने हुए हैं, कहीं गांव के गौरैया बाबा, कहीं बली और दारू लेनेवाली देवी. कई जगहों पर कई और रूपों में बुद्ध के विराजमान होने की सूचना मिलती है. हम गया जिले में भी भटकना शुरू करते हैं. नरौनी गांव में. गांव के महादेव स्थान और गौरैया स्थान में बुद्ध स्तूप दिखते हैं. बताया जाता है कि यहां हर शुभ आयोजन में स्तूप के पास प्रतिमा पर बकरे की, मुरगे की बली दिये जाने की परंपरा है. साथ में दारू का चढ़ावा भी परंपरा में ही शामिल है. क्यों, कब से... कोई नहीं बताता. वहां मिले पुजारी राजकिशोर मांझी भी नहीं बता पाते. नसेर गांव जाते हैं, जहां बुद्ध गांव के ब्रहम बाबा बन गये हैं और ग्रामीण लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं. इस गांव के लोग स्वीकार करते हैं कि ये बुद्ध ही हैं, सबको पता है लेकिन हमलोगों ने इन्हें ब्रहम बाबा बना दिया है.


ब्रहम बाबा बने बुद्ध लोहे की कील में जकड़े दिखते हैं. दुब्बा गांव के बाहर एक बुद्ध देवी के रूप में दिखते हैं. हनुमान के रूप में भी बुद्ध मिलते हैं. गुनेरी गांव पहुंचने पर वहां बुद्ध के भैरो रूप में होने की जानकारी दी जाती है. इन गांवों के बाद हम कुर्किहार जाते हैं. कुर्किहार गया जिले के वजीरगंज प्रखड में स्थापित वह गांव है, जहां गली-गली में, घर-घर में बुद्ध स्थापित हैं. यहां भी बुद्ध देवी-देवता बन गये हैं. गया जिले में बुद्ध के इतने रूप देखने के बाद जिले के दायरा से निकल हम नालंदा जिले के बड़गांव में पहुंचते हैं. यहां श्री तेलिया भंडार भैरो मंदिर में भूमि स्पर्श मूद्रा में बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा दिखती है. टोटका और टोनेवाले बुद्ध हैं यह. जो श्रद्धालु आते हैं, अपने बच्चे को इसी प्रतिमा की तरह मोटे होने की दुआ मांगते हैं. बच्चा हष्ट-पुष्ट और निरोग रहे इसके लिए बुद्ध को तेल चढ़ाते हैं, अनाज चढ़ाते हैं.


बुद्ध इस रूप में यहां कब ढले, यह सही सही कोई नहीं बता पाता. दुब्बा, कुर्कीहार, तारापुर, मंडा, नगमागढ़, भरौधा, पिरमा, नसेर, गुनेरी, तरोबा, मंगरावां, पत्थरकट्ी, कउआडोल, घुरियावां कचनावां, तपोवन, जेठियन, झरना-सरेन, बुद्धगेरे, ढ़ोगेश्वरी, मोचारीम, ब्रह्मयोनि, केशपा, धराउत, गुरपा, भुरहा, नसेर, गुनेरी, देवकुली, नरौनी, कुर्कीहार, धराउत, मंडा, तारापुर, पत्थरकट्टी, जेठियन, सरेन-झरना, औंगारी, कउआडोल, घेजन, बिहटा, उमगा पहाड़, शहर तेलपा, तेलहाड़ा, केनार, गेहलौर घाटी... ऐसे कई गांवों की जानकारी मिलती है, जहां बुद्ध का रूप-स्वरूप अपने हिसाब से ढले हुए हैं. कहीं सिरकटे बुद्ध, कहीं नली में बुद्ध, कहीं खून लेनेवाले बुद्ध, कहीं देवी बुद्ध, कहीं और अलग-अलग रूपों में.


प्रभात शांडिल्य कहते हैं, गांवों की बात कौन करे, खुद बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर प्रांगण में युधिष्ठिर, भीम, अर्जून, नकूल और सहदेव के रूप में बुद्ध की पूजा हो रही है. अब बोधगया में भी क्या यह बताने की जरूरत है कि ये प्रतिमाएं बुद्ध की ही है. शांडिल्य कहते हैं, बुद्ध धर्म का प्रभाव जब से घटना शुरू हुआ, लोगों ने अपने अपने हिसाब से बुद्ध की प्रतिमाओं की पूजा शुरू कर दी, जिसका नतीजा यह है कि आज बुद्ध अलग अलग रूप में चहुंओर दिख रहे हैं.


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