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मेरे गांव की कहानी, बाबूजी की जुबानी


कुम्हउ रेलवे स्टेशन, जो गांव से सटे ही है

संयोग से बचपने से अपने मूल गांव में रहना नहीं हो सका. ननिहाल गांव औरंगाबाद-ओबरा में ही जनमा, वहीं के माटी-पानी से एकाकार हुआ. मेरा मूल गांव यानी सासाराम बाईपास के पास का गांव कुम्हउ. अब तो वह गांव भी नहीं रहा, शहर का हिस्सा होता जा रहा है. अपार्टमेंट वगैरह बनने लगे हैं गांव में ही. सासाराम भी बिल्कुल पास है. कुछ सालों पहले तक तो घर के छत से शेरशाह का मकबरा तक दिखता था गांव से ही. गांव के पास ही कुम्हउ रेलवे स्टेशन भी है. गांव में ही अब रेलवे का यार्ड बन रहा है. इतने के बावजूद गांव के अंदर गांव बचा हुआ है. गांव बचा हुआ भर नहीं, बल्कि जीवंतता से है.


अब जब अपने मूल गांव नहीं रहा तो बाबूजी के साथ भी रहना कम हो सका. उनके साथ गप्प-सड़ाका का अवसर जीवन में कम मिला. बाबूजी अध्यापकी के पेशे में रहें तो गांव में रहें. लेकिन बाबूजी के सान्निध्य में अगर रहता तो यह तय था कि किस्सा-कहानियों का मास्टर बन जाता. उनके पास हर बात पर कोई न कोई गीत-कविता का रेफरेंस होता है, श्लोक होता है, लोक या शास्त्र का रेफरेंस होता है. कहावत, मुहावरा,चौपाई, कथा-कहानी से लेकर श्लोक तक.


एक बार अपने गांव पर एक कहानी अखबार में लिखी. प्रभात खबर अखबार में. खूब बढ़ियां कहानी थी. कहानी में था कि कैसे हमारे गांव में मुसलमान कम हैं फिर भी इलाके में मुहर्रम सबसे बड़े लेवल पर हमारे यहां ही होता है. सारे हिंदू मिलकर करते हैं. आदि-आदि. उसमें ही यह भी लिख दिया था कि हमारा गांव कभी नशेड़ियों-हिरोइंचियों का गांव रहा. इस बात से गांववाले नाराज हो गये.


गांव में मुझे सब पहचानते नहीं लेकिन जो हमारी पीढ़ी के रहे हैं, वह जानते हैं, क्योंकि अपने मूल गांव में भी एकाध साल स्कूल में पढ़ा था. गांववालों को मेरी कहानी का बुरा लगा तो वह घर पर जम गये. मेरे बड़े भाई गांव के मुखिया. सुबह-सुबह सौ से अधिक लोग जमा हुए घर पर. सबने कहा कि निरालाजी ई का लिख देले बानी. बाबूजी आये. पूछें कि क्या हुआ? सबने कहा कि राउरे लइका नु हवें निरालाजी. बाबूजी ने कहा कि हं. गांववालों ने कहा-बताईं केतना बड़ गलती कर देले बानी. बाबूजी ने कहा कि का केहू के गाली-गलौज कईले बाड़े? नशाबाजी कर के केहू के घर के सामने पड़ल रहले? केहू के संगे अभद्रता कईले बाड़े? केहू के इहां चोरी कईले बाड़े? गांववालों ने कहा कि ना, उहां के लिखने बानी कुछ? बाबूजी ने कहा कि हम बाप के तौर पर उनकर व्यक्तिगत आचरण से होखेवाला नुकसान के जिम्मेवारी लेब. व्यक्तिगत आचरण अगर उनकर खराब हो गईल बा आ ओह से केहू के भा सामजिक नुकसान हो रहल बा त बाप होखे के नाते उनका के बोलाईब, जे सजा समाज दिही, लागू करवाईब बाकि उनकर लिखे-पढ़े के पेशा में हमार ना तो कवनो भूमिका बा, ना हम उनकर गाइड हईं. एकरा खातिर उनकर संपादक लोग से बात करें के चाहीं.


गांव के लोग कुछ आगे कह नहीं सकते थे. वे लौट गये. बाबूजी ने मुझे फोन किया. बोलें कि तहरा जब अपना गांव पर लिखे के अब मन करत बा त पहिले गांव के कहानी जान. हर गांव के आपन कहानी होला, ओकरा के उहां के नागरिक के जाने के चाहीं. फिर बाबूजी ने कहानी बताना शुरू किया कि मेरे गांव का नाम कुंभउ कैसे पड़ा जो अब कुम्हउ के नाम से जाना जाता है.


यह चलित है कि सहस्त्राबाहु और परशुराम के नाम पर सहसराम यानि सासाराम का नाम है. जब दोनों के बीच युद्ध की शुरुआत हुई तो यज्ञ के कुंभ की स्थापना हुई. यज्ञ हुआ और वहां कुछ स्थानीय वासी रहने लगे. मुगलकार में फतेहपुर शिकरी के इलाके से एक गांव का पलायन शुरु हुआ. पूरा गांव वहां से चला और चलते-चलते कुंभ पहुंचा. वहीं डेरा डाला. जो कुछ स्थानीय वाशिंदे थे, उनसे पूछा कि इस जगह का नाम क्या है, बताया गया- कुंभ. बसेरा डालनेवालों ने पूछा कि कौन सा कुंभ. स्थानीय वाशिंदों ने बताया- उ वाला कुंभ. दोनों के मिलान से कुंभउ गांव बना.


शासक के तौर पर नवलकिशोर सिंह थे और वे फतेपुर से सभी जातियों के समूह को लेकर चले थे और राजपुरोहित के तौर पर डाला तिवारी. अगली यात्रा के लिए शासक ने डाला तिवारी से सलाह लिया- पुरोहित ने बताया कि सुबह आंख खुलने के बाद जो सामने जो दिखे, उसकी बली देनी होगी. शासक तैयार लेकिन पुरोहित को रात भर नींद नहीं आयी और इसी सोच में रहे कि क्या पता सुबह क्या सामने आ जाये. कोई जानवर ही आये, यह तो तय नहीं! सुबह-सुबह राज पुरोहित खुद शासक के दरवाजे पर खड़ा हो गये. शासक हैरत में लेकिन राज पुरोहित ने कहा कि घबराये नहीं, मैंने जैसा कहा था वैसा ही करे, मेरी ही बली दे, मैं ही सामने आया हूं. शासक तैयार नहीं थे लेकिन पुरोहित ने वचन की याद दिलायी, डाला तिवारी ने अपनी जान दे दी. गांव वहीं बसा, प्राय: सभी जातियों व सभी पेशे के लोगों का गांव. डाला तिवारी की बली तो दे दी गयी लेकिन तब से ही राजपूत परिवारों ने उनकी पूजा भी शुरु कर दी. कुम्हउ में आज भी हर शुभ काम में डाला बाबा की पूजा की परंपरा है.


एक छोटी सी बात पर गांव के रोचक और रोमांचक इतिहास को जानने का अवसर मिला. और साथ ही यह तर्क भी उनका ठीक लगा कि जैसे पूरे देश के कुछ हिस्से में हिंदू —मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ने से हमारे गांव के मुहर्रम की परंपरा पर कोई असर नहीं पड़ा है, हिंदू और मुसलमान आपस में दुश्मन नहीं हुए हैं ना एक दूसरे को दूसरे नजरिये से देखते हैं, वैसे ही कुम्हउ गांव के कुछ लफंगों के हिरोइंची हो जाने, नशेड़ी हो जाने या दूसरे दुर्गुणों के भर जाने से पूरे गांव को उसमे समेट लेना भी तो ठीक नहीं...


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