• Nirala Bidesia

‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’

कथाकार-फिल्मलेखक शैवाल से 2015 में हुई बातचीत का प्रमुख अंश



आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, ऐसे में लेखन की प्रेरणा कहां से मिली?

हम लोग मूल रूप से बिहार के ‘बाढ़’ कस्बे के रहने वाले हैं. वहीं पढ़ाई-लिखाई हुई. मेरे पिताजी राजकमल चौधरी (प्रसिद्ध मैथिल और हिंदी लेखक) के पिता के साथ शिक्षक थे. बिहार के एक उपन्यासकार अनूप लाल मंडल के साथ भी उन्होंने काम किया. पिताजी भी लिखते थे. इसका असर मुझ पर और मेरे बड़े भाई पर भी पड़ा. आठवीं क्लास से मैं भी बाल कविताएं लिखने लगा. बाल भारती आदि में कविताएं छपने लगीं. मैट्रिक पास किया तो बड़ों के लिए कविताएं लिखने लगा. फिर इंटर पास करने के बाद मैं और बड़े भाई मिलकर ‘कथाबोध’ नाम की पत्रिका निकालने लगे. शे.रा. यात्री, नरेंद्र कोहली जैसे लेखकों ने उस वक्त हमारी पत्रिका में लिखा बाकी जो बेहतरीन कहानीकार होते थे, हम लोग उनकी कहानियां छापते थे. जो स्थानीय लेखक थे, जिनकी कहानियां नहीं छपती थीं, उनकी किताबें भी सहयोग के तौर पर छापते थे, इस तरह लेखन से लगाव होता गया.

आप कविताएं लिखते थे लेकिन पहचान कथाकार की है. कथा की दुनिया में कब प्रवेश किया?

जब से कथाबोध पत्रिका निकालने लगा तभी से कहानियों की समझ होने लगी थी. ग्रेजुएशन के पहले साल में मैंने ‘और सीढि़यां टूट गईं…’ शीर्षक से एक कहानी लिखी. वह कहानी ‘रेखा’ पत्रिका में प्रकाशित हुई. उसके बाद ‘अपर्णा’, ‘कात्यायनी’ आदि पत्रिकाओं में कहानियां भेजने लगा. कहानियां तो लिखने लगा लेकिन कविता से न तो सरोकार कम हुआ, न लिखना बंद किया.

यानी कि तब से लगातार लिख रहे हैं!

नहीं. अभी तो लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे किस्म की परेशानी सामने आ गईं. हम भाइयों ने जिस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था, वह एक साल बाद बंद हो गई. इस बीच पिताजी की तबियत ज्यादा खराब हुई तब उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया. बड़े भाई की भी तबियत खराब रहने लगी. घर में आर्थिक संकट था. मैंने तब कॉलेज में नया-नया दाखिला लिया था. संकट के उस दौर में मैंने सब छोड़-छाड़कर अर्थोपार्जन की ओर ध्यान लगाया और एक साथ पांच-छह ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. उससे जो आमदनी होती थी, उससे अपनी पढ़ाई भी करता था और घर की देखरेख भी.

इस तरह लेखन छूट जाने पर एक लंबा गैप रहा. लेखन से एक लंबे समय तक दूरी बनी रही. वह तो जब बीएससी आखिरी साल में पढ़ रहा था तो राजकमल चौधरी का एक पत्र आया, जिसमें लिखा था कि वे बाढ़ आने वाले हैं. नीलम सिनेमा हॉल के मैनेजर को भी बता दीजिएगा कि आने वाला हूं. आप और क्या-क्या लिख रहे हैं, यह भी देखूंगा और यह भी बताइए कि आप लेखन के अलावा और क्या करते हैं? तब मैं क्या जवाब देता कि अब लेखन छोड़कर सब करता हूं. बीएससी के बाद साइंस टीचर के रूप में मेरी नौकरी राजगीर के पास एक गांव में लगी. मुझे बुलाकर ले जाया गया, क्योंकि उस समय साइंस टीचर कम मिलते थे, उनकी बड़ी इज्जत भी होती थी लेकिन उस गांव में सांप्रदायिक तनाव इतना रहता था कि मैं नौकरी छोड़कर चला आया. फिर रिजर्व बैंक फील्ड सर्विस में नौकरी की लेकिन 11 बाद वहां से भी नौकरी छोड़नी पड़ी. बाद में प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक के तौर पर मेरी नौकरी लगी और पटना जिले के बाढ़ को छोड़कर घोसी में नौकरी करने आ गया. वही घोसी इलाका मेरे कथालेखन का गुरु बना और आज भी कथालेखन के क्षेत्र में उसी इलाके को मैं अपना गुरु मानता हूं.

वह इलाका कैसे गुरु हुआ?

वहां जिस पद पर आया था, उसके लिए पूरे इलाके को घूमना जरूरी था. घूमता रहा तो फिर से कथाकार मन जागृत हो गया. मैं हर 15वें दिन एक कहानी लिखकर ‘कहानी’ पत्रिका के संपादक संपत राय को भेजता था. वह मेरी हर कहानी लौटा देते और लिखते कि शैवाल तुम में बड़ी आग है लेकिन इस आग को एक आकार कैसे दिया जाए, फिलहाल मैं नहीं समझ पा रहा इसलिए यह कहानी लौटा रहा हूं. उनके बार-बार लौटाने के बाद भी मैंने लिखना नहीं छोड़ा. उसी क्रम में 1976 में ‘दामुल’ कहानी मैंने भेजी और वह वहां छप गई. घोसी में रहते हुए ही मैंने ‘कहानी’ पत्रिका को कहानी भेजने के साथ ही, ‘रविवार’ पत्रिका मंे ‘गांव’ नाम से कॉलम लिखना शुरू किया. गांव में मेरी एक कहानी ‘अर्थतंत्र’ भी छप चुकी थी, साथ ही धर्मयुग में ‘समुद्रगाथा’ कहानी भी छपी थी.

कविताओं से कहानियों की दुनिया, फिर फिल्म लेखन की प्रेरणा कहां से मिली?

‘रविवार’ में एक पत्रकार अरुण रंजन थे. 1980 के करीब बिहारशरीफ में दंगा हुआ था. सभी पत्रकार बिहारशरीफ जा रहे थे. मैं भी अरुण रंजन के साथ गया. सबने रिपोर्ट वगैरह लिखी, मैंने बिहारशरीफ दंगे पर कुछ छोटी-छोटी कविताएं लिखीं. कविताएं छपीं. तब बिहारशरीफ दंगे पर प्रकाश झा एक डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे. उन्होंने मुझे पत्र लिखा कि वे अपनी डॉक्यूमेंट्री में मेरी कविताओं का इस्तेमाल करना चाहते हैं. इस तरह प्रकाश झा से मेरे रिश्ते की शुरुआत हुई. बाद में उनसे खतो-किताबत का रिश्ता बन गया. उन्होंने फिल्म के लिए और कहानियां मांगी, मैंने दे दीं. समुद्रगाथा भेजी, उन्हें पसंद आईं. फिर कालसूत्र कहानी पर बात हुई. ‘दामुल’ की कहानी कालसूत्र नाम से ही प्रकाशित हुई थी. तीन साल तक ‘दामुल’ पर काम चला और बाद में 1985 में फिल्म आई तो सबने देखा-जाना. उस साल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उसे सर्वोच्च फिल्म का पुरस्कार भी मिला. उसके बाद ‘सारिका’ में एक कहानी प्रकाशित हुई थी ‘बेबीलोन’, प्रकाशजी उस पर भी फिल्म बनाना चाहते थे, बात भी हुई थी लेकिन किसी वजह से वह रुक गई.


प्रकाश झा के साथ इतनी फिल्मों पर बात की, साथ मिलकर दामुल जैसी फिल्म भी दी. फिर आगे बात क्यों नहीं बन सकी?

प्रकाश झा जी के साथ उसके बाद मृत्युदंड फिल्म तो की ही थी मैंने. ऐसा नहीं कि प्रकाश झा से मेरे व्यक्तिगत रिश्ते कभी खराब हुए, अब भी उनसे बात होती है. आज भी मैं उन्हें बड़े गुलाम अली खां ही कहता हूं और वे मुझे फटीकचंद औलिया बुलाते हैं. व्यक्तिगत रिश्तों की गर्माहट बनी हुई है लेकिन फिल्मों में हमारे रास्ते बदल गए. प्रकाशजी ने दूसरी तरह की फिल्मों की ओर रुख कर लिया, उन्होंने बाजार के बड़े रास्ते की ओर रुख कर लिया पर मेरा मन कभी उस बड़े-चौड़े रास्ते के प्रति आकर्षित नहीं हुआ.

दामुल इतनी चर्चित हुई, राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, मृत्युदंड की कहानी को उस साल की सर्वश्रेष्ठ कहानी की श्रेणी में नामित किया गया, तो क्या मुंबईवालों ने कभी संपर्क नहीं किया?

क्यों नहीं किया! बहुत बार संपर्क किया और मैं लगातार काम करता रहा लेकिन मैं अपनी जमीन छोड़कर काम नहीं कर सकता. जब मैं घोसी रहने गया और बाद में गया आया तो लगा कि अपने जीवन में कम से कम मध्य बिहार की ही बड़ी-छोटी घटनाओं का साहित्यिक दस्तावेजीकरण कर दूं, तो मेरे कर्तव्य के लिए यह बड़ी बात होगी. मैंने ऐसा करने की हरसंभव कोशिश भी की. मध्य बिहार में कोई ऐसी घटना-परिघटना नहीं हुई, जिसे मैंने अपनी कहानियों में नहीं लिया. यह मेरी प्राथमिकता रही लेकिन प्रकाशजी के इतर ‘पुरुष’ फिल्म बनी तो उसकी स्क्रिप्ट लिखी. राजन कोठारी ने जब ‘दास कैपिटल’ बनाने की सोची तो उनका साथ भी दिया. प्रकाशजी के ही असिस्टेंट और मित्र अनिल अिजताभ ने जब भोजपुरी फिल्म बनाने की सोची तो पहली बार भोजपुरी फिल्म ‘हम बाहुबली’ लिखी और अभी निर्देशकों की मांग के बाद कम से कम चार कृतियों की स्क्रिप्टिंग का काम हो चुका है, उन पर काम चल रहा है. वैसे काम लगातार चलता ही रहा, कभी रुका नहीं.

केतन मेहता की फिल्म ‘मांझी- द माउंटेनमैन’ के प्रोमो में उन्होंने आपका नाम डायलॉग कंसल्टेंट के बतौर दिया है. उनसे कैसे जुड़े? फिल्म के बारे में क्या राय है?

इसके लिए तो पहले केतन मेहता को बधाई और बहुत शुभकामनाएं कि जिस विषय पर फिल्म बनाने की बात 1980 से बड़े-बड़े निर्देशक करते रह गए, सोचते रह गए, स्क्रिप्ट वगैरह पर काम कर के भी रुक गए, उस फिल्म को लाने का काम केतन ने किया. केतन मेहता बड़े फिल्मकार हैं. 2013 में एक दिन वे पत्नी दीपाजी (दीपा साही) के साथ मेरे घर आए. गया की बेतहाशा गर्मी में हाथ वाला पंखा लेकर पसीने से तर-ब-तर होकर चार घंटे तक दशरथ मांझी पर बात करते रहे. मुझे जितनी जानकारी थी, मैंने उनसे साझा की. स्क्रिप्ट में कुछ सुझाव-सलाह देने थे, वो दिए. बाद में प्रकाश झा जी का फोन आया कि डायलॉग भी देख लीजिए तो प्रकाशजी की बातों के बाद मैं कुछ बोल नहीं पाता, न आगे-पीछे पूछ पाता हूं. केतनजी बड़े फिल्मकार और नेकदिल इंसान हैं ही, तो डायलॉग्स में जो संभव था, वह भी किया. और अब तो फिल्म ही रिलीज हो चुकी है. फिल्म से सहमति-असहमति की बात अलग हो सकती है लेकिन केतन मेहता के साहस को सलाम करना चाहिए, वरना तीन दशक से अधिक समय से बॉलीवुड की दुनिया दशरथ के कृतित्व व व्यक्तित्व को समझने में ही ऊर्जा लगाती रही.

तीन दशक का क्या अर्थ? पहले किसने कोशिश की?

बात 80 के दशक की है. दामुल बन चुकी थी. उसी वक्त मेरी एक कहानी धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी- आदिमराग. उस कहानी के छपने की भी एक कहानी थी. आदिमराग की पूरी कहानी, दो प्रेम कहानियों की थी. एक कहानी दशरथ मांझी की और दूसरी कहानी जेहल की. दोनों की प्रेम कहानी समानांतर रूप से आदिमराग में चलती है. मैं उस कहानी के जरिये सिर्फ यह बताना चाहता था कि किसी भी प्रेम की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर ही होती है लेकिन जब उसका जुड़ाव समूह से हो जाता है तो वह उद्दात रूप ले लेता है और क्रांति होती है और तब दशरथ मांझी जैसी प्रेम की निशानी पहाड़ काटने के सामने शाहजहां का ताजमहल भी बौना लगने लगता है. मैंने यह कहानी धर्मवीर भारती को भेजी. उन्होंने कहा कि जेहल की कहानी विश्वसनीय है लेकिन दशरथ मांझी वाली कहानी अविश्वसनीय है, इसलिए इसके हिस्से को काटकर छापूंगा. दशरथ की कहानी कट गई, आदिमराग कहानी छपी. उस पर देशभर से प्रतिक्रिया आई.

उसी क्रम में मैं मुंबई गया तो बासु भट्टाचार्य मुझसे मिलने मनमोहन शेट्टी के दफ्तर में आए और बोले कि ‘आदिमराग’ पर फिल्म बनाना चाहता हूं, आप उसकी स्क्रिप्ट पर काम कीजिए. मैंने कहा कि धर्मयुग में आदिमराग कहानी अधूरी छपी है, पूरी तो मेरे पास है. वह तो सिर्फ जेहल की कहानी है, दशरथ की कहानी को भी जोड़ना होगा. बासु को भी दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लगी. बावजूद इसके उन्होंने उस पर काम शुरू करवाया, स्क्रिप्टिंग हुई लेकिन फिल्म बन न सकी. फिर आदिमराग की ही मांग गौतम घोष ने की. उन्होंने संदेशा भिजवाया कि आदिमराग पर फिल्म बनाना चाहते हैं, उन्हें भी मैंने यही कहा िक कहानी अधूरी है, कहानी दशरथ से पूरी होती है. पर उन्हें भी दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लगी.

- क्यों सबको दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लग रही थी जबकि 60 के दशक में पहाड़ काटने का काम शुरू कर 22 सालों के मेहनत से दशरथ मांझी 80 के दशक के आरंभ में ही पहाड़ काटने का काम पूरा कर चुके थे.


- दशरथ को जीते-जी उनके काम के लिए वह सम्मान कहां मिला. वह तो मृत्यु के कुछ साल पूर्व से उन्हें वह सम्मान मिलना शुरू हुआ. अखबारों में, मीडिया में खबर आयी, बावजूद इसके एक बड़ा खेमा ऐसा भी था, जो दशरथ को उसके इस विराट का श्रेय नहीं लेने देना चाहता था. इसलिए दशरथ मांझी के पहाड़ काट लेने के बाद भी मीडिया का एक खेमा यह कहता रहा कि दशरथ यदि पहाड़ काटे थे तो पहाड़ काटने के बाद निकलनेवाला पत्थर कहां गया. उसकी छर्री कहां गयी. वन विभाग ने पहाड़ काटने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की. आदि-इत्यादि. संभ्रांत व सामंतमिजाजी समाज ने तो कभी चाहा ही नहीं कि प्रेम के ऐसे उद्दात स्वरूप का श्रेय मांझी को जाये, इसके लिए वह आखिरी समय तक माहौल बनाने में लगा रहा. मुझे तो लगता है कि बाद के दिनों में दशरथ मांझी ने आध्यात्मिकता में मन इसीलिए लगा लिया था कि शायद उन्हें सर्वमान्यता मिले. वे कबीरपंथी हो गये थे. लेकिन तब भी उन्हें श्रेष्ठतावादी व शुद्धतावादी समाज उन्हें वह मान्यता नहीं दिया.


- लेकिन नीतीश कुमार तो उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाये थे न...!


- यह सब तो बहुत बाद की बात है. 82 में दशरथ मांझी ने पहाड़ काट दिया था लेकिन तीन दशक बाद उन्हें सम्मान मिलना शुरू हुआ.


- आपकी तो बात-मुलाकात कई बार की होगी. पहाड़ काटने की सही घटना क्या है?


- कई बार मिला. हम एकभाषी थे तो ज्यादा आत्मीयता से मगही में बात होती थी. वे मेरे दफ्तर में भी आते थे मेरे. पहाड़ में पतला रास्ता पहले से था. बहुत ही संकरा. वे पहाड़ के उस पार खेत में काम करने जाते थे. उनकी पत्नी फगुनी देवी उसी संकरे रास्ते से उनके लिए खानापीना लेकर खेत में जाया करती थी. एक दिन वह जा रही थी, पहाड़ के उस दरबेवाले रास्ते में फंस गयी. खाना-पानी सब गिर गया. मिट्टी के बरतन में पानी था, वह भी टूट गया. दशरथ का प्यास के मारे हाल-बेहाल था लेकिन पानी उन तक पहुंच नहीं सका. वे पत्नी की हालत देखे. और उसी दिन तय किये कि यह फगुनी की गलती नहीं. कोई न कोई रास्ता निकालना होगा. फगुनी के लिए भी और उन तमाम महिलाओं के लिए भी, जो खेत पर खाना-पानी लेकर आती है रोज. दशरथ ने उसी दिन से अपने रोजमर्रा के मजदूरी को जारी रखा लेकिन समय निकालकर पहाड़ को काटना भी शुरू कर दिया और 22 सालों में उस रास्ते को बना दिया. दशरथ फगुनी से प्रेम करते थे लेकिन फगुनी के बहाने कई स़्ित्रयों की मुश्किलें उनके सामने नाची. यही होता है, प्रेम व्यक्तिगत होता है, लेकिन वह समूह का हो जाता है तो क्रांति हो जाती है. दशरथ ने क्रांति ही की. दुनिया में कोई मजदूर ऐसा नहीं होगा, जो अपनी मजदूरी करते हुए छेनी-हथौड़ी से ऐसा कीर्तिमान कायम कर दे, प्रेम की ऐसी निशानी दे दे.


- आपने कहा कि आदिमराग कहानी जो आपने लिखी, उसमें दशरथ की कहानी हटाकर सिर्फ जेहल की कहानी को प्रकाशित किया धर्मवीर भारती ने और जेहल की कहानी इतनी पावरफुल थी कि कई लोग उस पर फिल्म बनने को तैयार थे लेकिन आप साथ में दशरथ की कहानी को रखकर ही फिल्म बनाने की सलाह सबको दे रहे थे. जरा जेहल की कहानी बताये.


- जेहल भी गया जिले के ही थे. अतरी प्रखंड के इलाके के. मुसहर जाति के ही. दुल्लू सिंह एक जमींदार थे, उन्हीं के यहां बनिहारी करते थे जेहल. जेहल की शादी दुल्लू सिंह ने अपने ससुराल में करवा दी. राजमुनी से. राजमुनी के पिता नचनिया थे. राजमुनी की मां को दुल्लू सिंह के ससुर रखनी बनाकर रखे हुए थे तो जेहल की पत्नी के आने के बाद दुल्लू सिंह ने कहा कि तेेरी मां को मेरे ससुर रखनी रखे हुए हैं तो हम तुमको रखेंगे. जेहल क्या बोलता बेचारा लेकिन राजमुनी ने विद्रोह कर दिया. एक दिन अचानक वह घर से निकल गयी. रास्ते में जेहल मिला, उसका पति, जो टेउंसा बाजार से अपने मालिक के लिए गांजा लेकर आ रहा था. राजमुनी ने अपने पति से कहा िकवह जा रही है लेकिन एक दिन लौटकर आएगी, वह अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जिएगी. जेहल के साथ ही. राजमुनी वहां से भागी तो बनारस चली गयी. एक थियेटर कंपनी में नाचने लगी. इस बीच लोग जेहल को चिढ़ाते रहते थे कि तुम्हारी पत्नी तो दिखी थी, गया में कोठे पर, कोई कुछ और कहता. जेहल सबकी बात सुनता. वह मेरे पास भी आता था. वह मुझसे पूछता था कि सर, आपकी भी पत्नी है. वह भी तो भाग गयी होगी. पत्नी तो भाग ही जाती है न! जेहल बहुत ही इनोसेंट इंसान था. राजमुनी जिस थियेटर कंपनी में काम करती थी, वह कंपनी एक बार राजगीर के मलमास मेले में आयी तो राजमुनी भी उसमें आयी. राजमुनी को फिर से दुल्लू सिंह ने देख लिया, वह बलात फिर उस ेले जाने लगे, इस बार राजमुनी ने दुल्लू की हत्या कर दी और फिर भाग गयी. एक बार फिर से जेहल को किसी ने चिढ़ा कर कह दिया कि उसकी राजमुनिया तो नदी के उस पार मजार पर चादर चढ़ाने आयी है, अभी-अभी दिखी. जेहल भागते-भागते नदी किनारे आया. नदी के उस पार जाने का कोई रास्ता नहीं. वह भादो की उफनती हुई नदी में छलांग लगा दिया उस पार राजमुनी के पास जाने के लिए. उसकी लाश निकली. और संयोग हुआ कि कुछ देर बाद सच में राजमुनी को लेकर दारोगा उसके गांव में पहुंचा दृ राजमुनी उसके पास रहने आयी थी लेकिन जेहल जा चुका था. राजमुनी ने उसके लाश के पांव में ही अपनी चुड़ियों को तोड़ा. मैं समानांतर रूप से दशरथ और जेहल की प्रेम कहानी को लेकर आदिमराग लिखा था. यह बताने के लिए प्रेम का दायरा सिर्फ निजी स्तर पर होता है तो उसकी निष्पति कैसी होती है और जब प्रेम समूह से जुड़ता है तो उसका स्वरूप कैसे होता है.


- आपने यह कहानी भी प्रकाश झा को दी थी?


- प्रकाशझा जी प्रेम पर फिल्म नहीं बनाना चाहते. उनके विषय दूसरे होते हैं.उन्होंने बेबीलोन पर बात की. एक बार वे दिल्ली बुलाये. 18 घंटे में एक कहानी लिखी-अभिशप्त. तीन साल बाद उस पर मृत्युदंड फिल्म बनी. बासु को जेहल की कहानी पसंद थी.


- आप मुंबई जाते नहीं, मुंबई आपकी शर्तों पर आता नहीं. यह जिद क्यों?


- कोई जिद नहीं. मैं खुद को क्रीयेटिव बनाये रखने के लिए काम करता हूं. मुंबई के लिए नहीं. पुरुष फिल्म के दौरान राजकुमार संतोषी ने एक फिल्म की कहानी मांगी थी. मैंने हां कह दिया था लेकिन फिर मुंबई नहीं गया. मुझे होटलों में रहकर स्क्रिप्ट और कहानी लिखना पसंद नहीं. मैं अपनी जमीन पर रहकर काम करना चाहता हूं. जिससे मन मिलेगा, काम करूंगा, नही ंतो कोई बात नहीं. मैंने कभी अपनी आकांक्षा उतनी बड़ी की ही नहीं कि मंुबई का मोहपाश भारी पड़ जाये मेरे मन पर. एक बार विक्रम चंद्र ने कहा कि आप गया में क्या कर रहे हैं, आपको मुंबई होना चाहिए. मैंने उनको कहा कि आप मुंबई इंडस्ट्री के लिए लिखते हैं आप लंदन क्या कर रहे हैं? बात हंसी-हंसी में खत्म हो गयी.


- दशरथ मांझी पर और किन लोगों ने फिल्म बनाने की कोशिश की, आपकी जानकारी में?


- हमेशा ही कोई न कोई बात करता रहा. रुबिना गुप्ता ने तो डोक्यूमेंट्री भी बनायी. उस डोक्यूमेंट्री के लिए मैंने एक कविता भी लिखी- ‘‘ बोल देने से नहीं होता है प्रेम. क्रांति महज इतना नहीं है कि बोल दो नारा. उठा लो शस्त्र.प्रेम करना सीखो. जेसे यह श्वेत पुष्प जीना सीखता है रक्त समुदाय के साथ. मेरे भीतर.’’ और भी कई लोगों ने कोशिश. कुछ तो कहते हैं िकवे दशरथ मांझी से जीते-जी लिखवा लिये थे उनसे िकवे लिख दे कि उन पर फिल्म बनाने का अधिकार सिर्फ उनका होगा. लेकिन केतन मेहता इसमें बाजी मार ले गये. साहित्य हमेशा उपलब्ध रहा दशरथ मांझी पर. लेकिन साहित्य के क्रूर यथार्थ को लोक की रुचि के अनुसार सत्य में ढालने का काम ही तो निर्देशक का होता है, सिनेमा वही तो करता है और उस कहानी को केतन फिल्म के जरिये ला रहे हैं.


- आपने एक बात कही कि होटलों में रहकर कहानियां लिखने से वह बात नहीं आ पाती. क्या ऐसा है आज के फिल्मों के साथ.


- नहीं ऐसा कैसे कह सकते हैं. एक से एक फिल्में आ रही हैं. अच्छी कहानियां लिखी जा रही हैं. अनुराग कश्यप की फिल्म है, राजकुमार हिरानी की फिल्म है. और भी कई कहानियां हैं. दम लगा के हईसा, मसान... कई फिल्में आयी हैं. लेकिन मल्टीप्लेक्स के दौर में बड़े स्टार को ध्यान में रखकर कहानियां लिखी जाने लगी तो फिल्म का मामला गड़बड़ा गया. बड़े स्टार साल में कितनी फिल्में कर सकते हैं और स्टार है ही कितने. इसलिए स्टार के दायरे से फिल्मों को निकालना होगा. वह निकलने भी लगा है लेकिन फिर वही प्रेम और शादी के इर्द-गिर्द फंसता गया. प्रेम, शादी के बाद की दुनिया भी है, जो सिनेमा का इंतजार कर रही हैं. सिनेमा में कुछ निर्देशक उससे इतर की दुनिया को तो सामने ला रहे हैं लेकिन अभी भी गांव की वापसी का रास्ता नहीं दिख रहा. गांव को भी तो वापस लाना होगा.


- गांव भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे?


-कहां से बात कर रहे हैं आप? चलिए देखिए, एक से एक गांव मिलेंगे और उन गांवों में एक से एक कहानियां मिलेंगी. मध्ययुगीन क्रूरता अभी भी मिलेगी.


- केतन की फिल्म की स्क्रिप्ट तो आपने देखी होगी. क्या वे सही में दशरथ मांझी को लेकर आ रहे हैं?


- मैंने कहा कि सहमति-असहमति कई बिंदुओं पर हो सकती है लेकिन केतन को बधाई दीजिए िकवे इसे कर रहे हैं. तीन दशक तक अविश्वसनीय ही मानते रहे फिल्म इंडस्ट्री के लोग इस कहानी को और केतन इसे पूरा कर रहे हैं. बाकि कई बिंदुओं पर असहमति हो सकती है. वह अलग बात है. फिल्म आने पर उस पर बात होगी. केतन की यह फिल्म चल पड़ी तो याद रखिए कि दशरथ जैसे मामूली लोगों को लेकर बायोपिक फिल्मों का दौर लौटेगा और तब कई मांझियों की कथा सेल्यूलाइड के जरिये सामने आएगी और गांव-कस्बे में एक से बढ़कर एक नायक हुए हैं, जिनकी कहानियां दुनिया को प्रेरित कर सकती हैं. जैसे दशरथ की कहानी दुनिया में खास है कि एक मजदूर ने प्रेम की ऐसी निशानी दी कि शहंशाह का प्रेम हाशिये पर चला गया, वैसी ही कई कहानियां है अपने देश में.

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