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माउंटेनमैन दशरथ मांझी के इलाकेवाले लवमैन जेहल मांझी


मांझी द माउंटेनमैन फिल्म रिलीज होने पर जेहल मांझी को याद करने की कोशिश

आज से ‘मांझी- द माउंटेनमैन’ फिल्म सिनेमाघरों में आ रही है. बिहार के एक नायक पर बनी फिल्म. बिहार पर बड़े फलक पर, बड़े बैनर तले फिल्में पहले भी बनी है लेकिन अधिकांश फिल्में बिहार को दुनिया भर में अपराध, अपहरण, बदनामी का पर्याय रूप में स्थापित करने के लिए. तीसरी कसम जैसी फिल्में अपवाद रही हैं. ‘मांझी- द माउंटेनमैन’ पहाड़ पुरूष दशरथ मांझी के जीवन पर बनी फिल्म है.


दशरथ के बारे में सब जानते हैं. उनकी यह कहानी भी कि एक रोज उनकी पत्नी फगुनी उनके लिए खेत में खाना-पानी लेकर जा रही थी, पहाड़ के बीच संकरे रास्ते से होकर, उसी में उलझकर गिर गयी, दशरथ का प्यास के मारे हाल-बेहाल था. पानी भी न बचा पीने में, दशरथ ने फगुनी की हालत देखकर उसी दिन संकल्प लिया िक वे इस पहाड़ के संकरे रास्ते को चौड़े रास्ते में बदल देंगे. अपनी फगुनी के लिए ओर तमाम फगुनियों के लिए, जो रोज ही इस रास्ते में फंसकर या तो गिरती-पड़ती होंगी या फिर इस रास्ते से बचने के लिए कोसों लंबी यात्रा कर अपने पति या संतानों के लिए भोजन-पानी लेकर आती होंगी.



दो दशक तक अपनी मजदूरी का काम करते हुए दशरथ पहाड़ काटते रहे और अंततः काट दिये. फगुनी से अपने अगाध प्रेम को उन्होंने समूह के साथ विस्तारित किया. पहाड़ काटकर बना रास्ता प्रेम का अप्रतीम नमूना बन गया. दुनिया में शायद ही किसी मजदूर की प्रेम की निशानी इस रूप में हो. इस फिल्म को अब केतन मेहता बनाकर लाने में सफल हुए हैं जबकि इस विषय पर फिल्म बनाने की बात 1980 से बड़े-बड़े निर्देशक करते रह गये, सोचते रह गये, स्क्रिप्ट वगैरह पर काम कर के रूक गये. बीच में रुबिना गुप्ता जैसी डोक्यूमंेट्री मेकरों ने लघु फिल्में भी बनायी.


हाल ही में नीलय उपाध्याय ने दशरथ के संघर्ष और सृजन पर उपन्यास भी लिखा. लेकिन इन सबके बीच सेल्यूलाइड पर और उसके जरिये दुनिया में दशरथ की कहानी को फैलाने का श्रेय आज से केतन मेहता को मिलनेवाला है. केतन बड़े फिल्मकार हैं. उनकी इस फिल्म के कई दृश्यों से सहमति-असहमति की बात अलग हो सकती है लेकिन केतन मेहता के साहस को सलाम करना चाहिए कि उन्होंने उस नायक को केंद्र में रखकर बायोपिक फिल्म बनाने का साहस दिखाया, जिस नायक की कहानी पर बाॅलीवुड चिंतन-मनन करने में ही तीन दशक लगा दिया.


दशरथ पर फिल्म बनाने की बात की शुरुआत 80 के दशक से ही हुई थी लेकिन दशरथ के समय में ही, उसी गया इलाके में एक जेहल मांझी की भी प्रेम कहानी थी, जिसपर बाॅलीवुड के बड़े-बड़े निर्देशक इस कदर फिदा हुए कि दशरथ की बजाय जेहल की कहानी पर ही फिल्म बनाने की बात करते रहे. बासु भट्टाचार्य से लेकर गौतम घोष तक जैसे निर्देशक. जेहल और दशरथ की कहानी को प्रेम के फलक पर तब गया में रहनेवाले मशहूर कहानीकार शैवाल ने सामने लाया था. उस समय की मशहूर पत्रिका धर्मयुग के जरिये. धर्मयुग में शैवाल ने एक कहानी भेजी थी- आदिमराग. धर्मवीर भारती उसके संपादक थे. उसी आदिमराग कहानी पर बाॅलीवुड फिदा हुआ था. शैवाल केतन मेहता की इस फिल्म मांझी-द माउंटेनमैन के भी डायलाॅग कंसल्टैंट हैं. वह बताते हैं कि बात 80 के दशक की है. उनकी कहानी पर प्रकाश झा के सौजन्य से ‘दामुल’ फिल्म बन चुकी थी. उसी वक्त उनकी एक कहानी धर्मयुग में प्रकाशित हुई- आदिमराग.


उस कहानी के छपने की भी एक कहानी थी. आदिमराग की पूरी कहानी, दो प्रेम कहानियों की थी. एक कहानी दशरथ मांझी की और दूसरी कहानी जेहल की. दोनो की प्रेम कहानी समानांतर रूप से आदिमराग में चलती है. शैवाल कहते हैं, ‘‘ मैं दोनो कहानियों को साथ रखकर सिर्फ यह बताना चाहता था कि किसी भी प्रेम की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर ही होती है लेकिन जब उसका जुड़ाव समूह से हो जाता है तो वह उद्दात रूप ले लेता है और क्राति होती है. और तब दशरथ मांझी जैसे प्रेम की निशानी पहाड़ काटने के सामने शाहजहां का ताजमहल भी बौना लगने लगता है. मैंने यह कहानी धर्मवीर भारती को भेजी. उन्होंने कहा कि जेहल की कहानी विश्वसनीय है शैवाल लेकिन यह दशरथ मांझीवाली कहानी अविश्वसनीय है, इसलिए इसके हिस्से को काटकर छापूंगा. शैवाल की सहमति से दशरथ की कहानी कट गयी, आदिमराग कहानी छपी.


उस पर देश भर से प्रतिक्रिया आयी. उसी क्रम में शैवाल मुंबई गये तो बासु भट्टाचार्य से मुलाकात हुई. बासु ने कहा िकवे ‘आदिमराग’ पर फिल्म बनाना चाहते हैं. शैवाल ने कहा कि आदिमराग की छपी हुई कहानी अधूरी है, दशरथ के बिना वह कहानी पूरी नहीं होती, जो मेरे पास है.आदिमराग की छपी कहानी तो सिर्फ जेहल की कहानी है, दशरथ की कहानी को भी जोड़ना होगा. बासु को भी दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लगी. बावजूद इसके उन्होंने उस पर काम शुरू करवाया, स्क्रिप्टिंग हुई लेकिन फिल्म बन न सकी. फिर आदिमराग की ही मांग गौतम घोष ने की. उन्होंने भी कहा कि आदिमराग पर फिल्म बनाना चाहते हैं, उन्हें भी दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लगी.


दशरथ की कहानी अविश्सनीय लगने की वजहें भी थी. मीडिया में यह बात आ चुकी थी कि दशरथ ने पहाड़ काट दिया है लेकिन समानांतर रूप से एक वर्ग ऐसा भी था, जो तब दशरथ के इस काम पर उंगली उठा रहा था. शैवाल कहते हैं- दशरथ को जीते-जी उनके काम के लिए वह सम्मान कहां मिला. वह तो मृत्यु के कुछ साल पूर्व से उन्हें वह सम्मान मिलना शुरू हुआ. अखबारों में, मीडिया में खबर आयी, बावजूद इसके एक बड़ा खेमा ऐसा भी था, जो दशरथ को उसके इस विराट का श्रेय नहीं लेने देना चाहता था. इसलिए दशरथ मांझी के पहाड़ काट लेने के बाद भी मीडिया का एक खेमा यह कहता रहा कि दशरथ यदि पहाड़ काटे थे तो पहाड़ काटने के बाद निकलनेवाला पत्थर कहां गया. उसकी छर्री कहां गयी. वन विभाग ने पहाड़ काटने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की. आदि-इत्यादि. संभ्रांत व सामंतमिजाजी समाज ने तो कभी चाहा ही नहीं कि प्रेम के ऐसे उद्दात स्वरूप का श्रेय मांझी को जाये, इसके लिए वह आखिरी समय तक माहौल बनाने में लगा रहा.



मुझे तो लगता है कि बाद के दिनों में दशरथ मांझी ने आध्यात्मिकता में मन इसीलिए लगा लिया था कि शायद उन्हें सर्वमान्यता मिले. वे कबीरपंथी हो गये थे. लेकिन तब भी उन्हें श्रेष्ठतावादी व शुद्धतावादी समाज उन्हें वह मान्यता नहीं दिया. ऐसी कई वजहें थी, जिससे बाॅलीवुड के बड़े निर्देशक भी दशरथ की कहानी को सीधे तौर पर विश्वसनीय नहीं मान रहे थे और फिर दूसरी ओर प्रेम का तत्व जेहल की कहानी में ज्यादा था, जो फिल्म बनाने को प्रेरित कर रहा था तो दशरथ से पहले जेहल पर फिल्म बनाने की भी जल्दबाजी थी बाॅलीवुड में.


शैवाल बताते हैं कि जेहल भी गया जिले के ही थे. अतरी प्रखंड के इलाके के. मुसहर जाति के ही. दुल्लू सिंह एक जमींदार थे, उन्हीं के यहां बनिहारी करते थे जेहल. जेहल की शादी दुल्लू सिंह ने अपने ससुराल में करवा दी. राजमुनी से. राजमुनी के पिता नचनिया थे. राजमुनी की मां को दुल्लू सिंह के ससुर रखनी बनाकर रखे हुए थे तो जेहल की पत्नी के आने के बाद दुल्लू सिंह ने कहा कि तेेरी मां को मेरे ससुर रखनी रखे हुए हैं तो हम तुमको रखेंगे. जेहल क्या बोलता बेचारा लेकिन राजमुनी ने विद्रोह कर दिया.


एक दिन अचानक वह घर से निकल गयी. रास्ते में जेहल मिला, उसका पति, जो टेउंसा बाजार से अपने मालिक के लिए गांजा लेकर आ रहा था. राजमुनी ने अपने पति से कहा िकवह जा रही है लेकिन एक दिन लौटकर आएगी, वह अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जिएगी. जेहल के साथ ही. राजमुनी वहां से भागी तो बनारस चली गयी. एक थियेटर कंपनी में नाचने लगी. इस बीच लोग जेहल को चिढ़ाते रहते थे कि तुम्हारी पत्नी तो दिखी थी, गया में कोठे पर, कोई कुछ और कहता. जेहल सबकी बात सुनता.


जेहल विक्षिप्त सा हो गया था और मान लिया था कि पत्नियां भागने के लिए ही होती हैं, भाग ही जाती हैं, इसलिए वह सबसे पूछता भी था कि आपकी भी पत्नी है जी! है तो भाग गयी होगी! जेहल बहुत ही इनोसेंट इंसान था. राजमुनी जिस थियेटर कंपनी में काम करती थी, वह कंपनी एक बार राजगीर के मलमास मेले में आयी तो राजमुनी भी उसमें आयी. राजमुनी को फिर से दुल्लू सिंह ने देख लिया, वह बलात फिर उस ेले जाने लगे, इस बार राजमुनी ने दुल्लू की हत्या कर दी और फिर भाग गयी.


एक बार फिर से जेहल को किसी ने चिढ़ा कर कह दिया कि उसकी राजमुनिया तो नदी के उस पार मजार पर चादर चढ़ाने आयी है, अभी-अभी दिखी. जेहल भागते-भागते नदी किनारे आया. नदी के उस पार जाने का कोई रास्ता नहीं. वह भादो की उफनती हुई नदी में छलांग लगा दिया उस पार राजमुनी के पास जाने के लिए. उसकी लाश निकली. और संयोग हुआ कि कुछ देर बाद सच में राजमुनी को लेकर दारोगा उसके गांव में पहुंचा. राजमुनी रिहा होकर अपने जेहल के साथ रहने आयी थी लेकिन जेहल दुनिया से जा चुका था. राजमुनी ने जेहल के लाश के पांव में ही अपनी चुड़ियों को तोड़ा. जेहल की इस करूण कहानी पर बालीवुड फिदा थी.

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