• Nirala Bidesia

महाभारत का वनपर्व-आज का समय-वेदव्यास की भविष्यवाणी


महाभारत इतिहास नहीं है. महाभारत मीथ है तो भी उसका वनपर्व पढ़ें. और उसे पढ़ते हुए आज के हाल—हालात का मिलान करें. वेदव्यास ने आज के समय के बारे में तब ही साफ साफ लिखा था.

निराला बिदेसिया

ग्लोबलाइजेशन के दौर में ग्लोबल विलेज की परिकल्पना. ग्लोबल-वार्मिग से मचनेवाली तबाही. दुनिया चिंतित है. ग्लोबलाइजेशन के कारण सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों में आती गिरावट भारत जैसे देश को भयभीत कर रही है. ग्लोबल वार्मिग के प्रभाव से तबाही की बात रोज हो रही . तापमान वृद्धि, जल संकट, खाद्यान्न संकट, ग्लेशियर क्षरण, इन सबके घातक दुष्प्रभाव, ऋतु चक्र और पर्यावरण के स्वभाव में परिवर्तन, पशु-पौधों पर घातक असर दिख रहे हैं. गांव में हो रहे बदलाव, शहरों की ओर पलायन, फैशन संस्कृति का एक समान प्रभाव, कच्ची उम्र में उभरती कामुकता और हिंसक बचपन भी दिख रहा है. महंगाई की मार से कैसे जनता त्रस्त है और बेरोजगारी की तसवीर भी स्पष्ट है. सामाजिक-आर्थिक कारणों से नक्सलवाद का बढ़ना भी चिंतित कर रहा है.

लेकिन, जो आज दिख रहा है और उसपर चिंता व्यक्त करने के लिए विशेषज्ञ सामने उभर रहे हैं, वह सब हजारों वर्ष पहले ही कहा जा चुका है. यह सब दर्ज है, महाभारत के वनपर्व (महाभारत, गीता प्रेस-गोरखपुर, द्वितीय खंड-वनपर्व, मारकण्डेय-युधिष्ठिर संवाद, पृ.1481-1494) अध्याय में. इस प्रसंग में युधिष्ठिर ने मारकण्डेय ऋषि से कलियुग में प्रलयकाल ओर उसके अंत के बारे में जानना चाहा था, जिसका उत्तर विस्तार से मारकण्डेय ऋषि ने दिया था. मारकण्डेय ऋषि ने कलियुग के अंत के परिदृश्य के संदर्भ में विस्तार से बताया था।


उन्होने कहा था कि कलियुग के अंतिम भाग में प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी होंगे, उनके विचार और व्यवहार में अंतर आएगा. सारा जगत एक वर्ण-एक जाति में परिवर्तित हो जाएगा. प्रलय के लिए मानव ही जिम्मेवार होगा. इस काल में सुगंधित पदार्थ नासिका में उतने गंधयुक्त प्रतीत नहीं होंगे. रसीले पदार्थ स्वादिष्ट नहीं रहेंगे. वृक्षों पर फल और फूल बहुत कम रह जाएंगे, उन पर बैठनेवाले पक्षियों की विविधता भी कम होगी. वन्य जीव, पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक निवास के बजाय नागरिकों के बनाए बगीचों व विहारों में भ्रमण करेंगे. वन-बाग और वृक्षों को लोग निर्दयतापूर्वक काटेंंगे. भूमि में बोये बीज ठीक प्रकार से नहीं उगेंगे, खेतों की उपजाऊ शक्ति समाप्त होगी, तालाब-चारागाह, नदियों के तट की भूमि पर भी अतिक्रमण होगा.

स्थिति ऐसी भी आएगी जब जनपद जनशून्य होने लगेंगे. चारों ओर प्रचण्ड तापमान संपूर्ण तालाबों, सरिताओं और नदियों के जल को सुखा देगा. लंबे काल तक पृथ्वी पर वर्षा बंद हो जाएगी. समाज खाद्यान्न के लिए दूसरों पर निर्भर होगा. थोड़े धन संग्रह कर धनाढ़ वर्ग उन्मत्त हो उठेगा. जनपदों की अपनी विशिष्टता खत्म होगी. सभी लोग एक स्वभाव-एक वेषभूषा धारण करने लगेंगे. गृहस्थ लोग शासकीय कर और महंगाई की मार से परेशान और भयभीत होकर लुटेरे बन जाएंगे. समाज के ज्ञानी कपटपूर्ण जीविका चलाने को मजबूर होंगे. लोग अपनी चिंता ही ज्यादा करेंगे और कैसे भी समृद्धि प्राप्त हो, इसी जुगत में रहेंगे.

युवक, युवावस्था में ही बूढ़े हो जाएंगे. सोलह वर्ष में ही उनके बाल पकने लगेंगे, उनका स्वभाव बचपन व किशोरावस्था में ही बड़ों जैसा दिखने लगेगा. सात-आठ वर्ष की बच्चियां माँ बन जाएंगी. गर्भधारण भी करने लगेंगी और 10-12 साल के लड़के भी पिता बनेंगे. अधिकांशत: एक-दूसरे को धोखा देनेवाले और गलत शील-स्वभाव वाले हो जाएंगे. कन्यादान पूर्वक विवाह प्रथा की जगह युवक-युवती स्वयं निर्णय लेकर साथ रहने लगेंगे. पर वे एक-दूसरे के विचार-व्यवहार को ज्यादा नहीं सहेंगे. दूसरे पुरुषों और नारियों से मित्रता में उन्हें आनंद आएगा.

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