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  • Nirala Bidesia

दुनिया की सबसे खूबसूरत प्रार्थना

Updated: Oct 14, 2019



निराला बिदेसिया


‘‘ हे धर्मेश. दुनिया मे शांति बनाए रखना॰ हिंसा, झूठ और बेईमानी की जरूरत मानव समुदाय और समाज को न पड़े॰ धर्मेश, हमें छाया देते रहना. हमारे बाल-बच्चों को भी. खेती का एक मौसम गुजर रहा है, दूसरा आनेवाला है. हम खेती के समय हल-कुदाल चलाते हैं. संभव है हमसे, हमारे लोगों से कुछ जीव-जंतुओं की हत्या भी हो जाती होगी. हमें माफ करना धर्मेश. क्या करें, घर-परिवार का पेट पालने के लिए अनाज जरूरी है न! समाज-कुटुंब का स्वागत नहीं कर पायेंगे, उन्हें साल में एक-दो बार भी अपने यहां नहीं बुलायेंगे तो अपने में मगन रहनेवाले जीवन का क्या मतलब होगा! इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए हम खेती करते हैं. खेती के दौरान होनेवाले अनजाने अपराध के लिए हम आपसे क्षमा मांग रहे हैं. धर्मेश, हमें कुछ नहीं चाहिए, बस बरखा-बुनी समय पर देना, हित-कुटुंब-समाज से रिश्ता ठीक बना रहे, सबको छाया मिलती रहे, और कुछ नहीं. ’’



रोगो नामक गांव गये थे हम. टाना भगतों का गांव है वह. अहले सुबह पहुंचे थे. सुबह—सुबह जब पहुंचे थे, तब यही प्रार्थना गा रहे थे सब. तिरंगे के नीेचे खड़ा होकर. बच्चे—बूढ़े—जवान, औरत—मर्द सब. कुड़ुख भाषा में बोल रहे थे. खेड़ेया टाना भगत ने उसे हिंदी में हमें समझाया था बाद में.सस्वर, सामूहिक तौर पर जब ये वाक्य खेड़ेया दुहराकर अर्थ बताते हैं तो रोम-रोम में सिहरन पैदा होती है. घंटी बजाने, हाथ-पांव धोकर दीप जलाने के बाद चरखेवाले तिरंगे के सामने गांधी टोपी पहने पुरुषों और रंगीन पाड़ेवाली सफेद साड़ी पहनी महिलाओं द्वारा अपने धर्मेश यानि ईश्वर से आराधना की यह पद्धति एक अजूबे की तरह सामने उपस्थित होती है.


उस समुदाय की जीवन पद्धति से बहुत हद तक अनजान अजनबियों के रोम-रोम में सिहरन पैदा होने की कई वजहें एक साथ हो सकती हैं. 21वीं सदी में यह समुदाय ऐसा है, जिसकी आकांक्षा दुनिया मे शांति कायम रखने, समाज की समरसता बने रहने, घर-परिवार-समुदाय को छाया मिलने, हित-कुटुंब से रिश्ते बनाये रखने भर की है. जतरा टाना भगत को नायक, गांधी को आदर्श माननेवाला टाना भगत समुदाय चरखाछाप तिरंगे की पूजा करते हैं, सत्य-अहिंसा को जीवन का मूल मंत्र मानते हैं, मांस-मदिरा से दूर रहते हैं, इतनी जानकारियां तो पहले से थी लेकिन इनके इलाके में दो दिन घूमने और इनके साथ एक पूरा दिन गुजारने के बाद इस बात का अहसास भी होता है कि सिर्फ आराधना में दिखावे के लिए उरांव भाषा में एक मंत्र के रूप में जपकर परंपराओं का निर्वाह भर नहीं करते, असल जिंदगी में उनके समुदाय का एक बड़ा हिस्सा वैसे ही हैं.


इस समुदाय को करीब से देखने की शुरुआत हम बारीडीह गांव से करते हैं. दो-दो पूर्व विधायकों का गांव. दोनों टाना भगत. दोनों कांग्रेसी. जिस रोज हम पहुंचते हैं, उस रोज एक पूर्व विधायक भेल्लोर इलाज के लिए गये होते हैं. उनसे मुलाकात नहीं होती, दूसरे पूर्व विधायक गंगा टाना भगत सेे अनुरोध करते हैं कि हमें टाना भगतों से सामूहिक तौर पर मिलना है, वे तुरंत दुपहिया टीवीएस मोपेड निकालते हैं और दो-तीन झोला टांग हमारे पथ प्रदर्शक की तरह आगे-आगे चलते हुए उस रोगो गांव में ले जाते हैं, जहां हम सामूहिक आराधना का वह नजारा देखते हैं.


गंगा टाना भगत कहते हैं कि आप किसी भी गुरुवार को आ जाइये, नियमित तौर पर हम टाना भगतों की सामूहिक बैठक होती है. या फिर साल भर में तीन बार होनेवाले हमारे समुदाय के विशेष सामूहिक आयोजन में आइये, जब हमलोग अपने-अपने घरों में तिरंगा बदलते हैं. वही तीन बार बदला हुआ तीन तिरंगा, तीन अलग-अलग बांसों में हर टाना भगत के घरों के बाहर या आराधना स्थल पर देखने को मिलेगा. तिरंगा बदलने का पहला आयोजन आषाढ़ माह में रथयात्रा मेला के 15 दिन पहले से शुरु होता है. जिस दिन तिरंगा बदला जाना होता है, उस रोज समुदाय के दूसरे लोग भी पहुंचते हैं, सामूहिक उपवास होता है, फिर सामूहिक आराधना और तब तिरंगा बदलकर भजन-किर्तन और उसके बाद सामूहिक भोज. दूसरे झंडे को कार्तिक में दीपावली के 15 दिन पहले से बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है और कमोबेश वही प्रक्रिया दुहराई जाती है और तीसरा झंडा होलिकादहन के पहले बदला जाता है.


इस तरह तरह तीन तिरंगे झंडे तीन लोकों का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर बार महिला पुरुष सात धागों वाला जनेउ बदलते हैं. सात धागों वाले जनेउ का मिथ यह है कि वह सतयुग कभी तो आएगा, जब समाज में सत्य का ही बोलबाला होगा. गंगा टाना भगत कहते हैं कि यदि दूसरे किस्म का आयोजन देखना हो तो दो अक्तूबर यानि गांधी जयंति को खक्सीटोला गांव आइये, जहां 74 स्वतंत्रता सेनानी टाना भगतों का स्मारक है. या फिर 10 अगस्त को, उस रोज टाना भगत मुक्ति दिवस मनाया जाता है.


गंगा टाना भगत से हम मुक्ति दिवस के बाबत पूछते हैं. वह बताते हैं कि कुछ साल पहले इसी दिन हमलोगों को जमीन का अधिकार मिल सका. हमारे समुदाय के नाम से पुस्तिका तैयार करने का काम शुरू हुआ. उन जमीनों का, जो आजादी की लड़ाई के दौरान ही अंगरेजों ने निलाम कर दिये थे और आजादी के बाद 1947 में ही उसकी वापसी के लिए विशेष एक्ट बनने के बावजूद हमें नहीं मिल पा रहा था. गंगा कहते हैं, ब्रिटिश काल में 875 टाना भगत परिवारों का 4332 एकड़ 66 डिसमिल जमीन नीलाम हुआ था, उसमें अभी सिर्फ 172 टाना भगत परिवारों का 1,836 डिसमिल जमीन ही वापस कराया जा सका है लेकिन हम मुक्ति दिवस इसलिए मनाते हैं कि चलिए आजादी के तुरंत बाद ही एक्ट बनने के बाद टाना भगतों की जमीन वापसी की प्रक्रिया की शुरुआत अब हो तो सकी. गंगा कहते हैं कि 100 साल हो गये, सरकारी फाइलों में हम एक अलग समुदाय के रूप में पूरी तरह नहीं स्वीकारे जा सके हैं, यह एक बड़ी कसक है!


आराधना के आयोजन में दूसरे गांवों से आये कई टाना भगत बतकही में इतिहास की बातें बताते हैं. खेड़ेया टाना भगत बताते हैं कि हमारे समुदाय के पूर्वज गांधीजी के पहले से ही अंगरेजों से और सत्य-अहिंसा की लड़ाई लड़ रहे थे. हमारे नायक व पुरोधा जतरा टाना भगत ने आदिवासी होते हुए आदिवासियों से अलग एक सामुदायिक परंपरा की शुरुआत अहिंसा मार्ग अपनाते हुए ही की थी. आदिवासियों में बली आदि की परंपरा है, हड़िया-दारू भी पारंपरिक चीजें हैं लेकिन वीर जतरा टाना भगत ने 20वीं सदी के आरंभ में ही आदिवासी होने के बावजूद मांसाहार, बली और नशे के खिलाफ अभियान चलाया था और तब आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा उनका अनुयायी बन गया था. झारखंड के छोटानागपुर, संथाल, मानभूम, सिंहभूम से लेकर पलामू तक और उड़िसा, छत्तीसगढ़ आदि इलाके में भी गहरा असर पड़ा और अलग-अलग नाम से यह आंदोलन चला, अनुयायी बनते गये. खेड़ेया इतिहास की बातें बताते हैं.


टाना भगत समुदाय के पुरोधा जतरा टाना भगत और गांधीजी में मुलाकात तक नहीं हुई थी, जब गांधीजी झारखंड पहुंचकर बेड़ो में तीन दिन के लिए रूके थे, उसके बहुत पहले ही जतरा टाना भगत दुनिया से विदा हो चुके थे. गांधी बेड़ो पहुंचे तब इस समुदाय की गतिविधियों के बारे में मालूम हुआ, जो बहुत पहले से ही अपने तरीके से सत्य-अहिंसा के प्रयोग के साथ अंगरेजों को लगान न देकर देशभक्ति की लड़ाई लड़ रहा था. खेती में कपास उगाकर अपने कपड़े भी खुद तैयार करता था. खेड़ेया कहते हैं, पहले हमारे समुदाय का झंडा सादा हुआ करता था, वेश भी साधा, जीवन भी सादा लेकिन गांधीजी के आग्रह पर हमारे समुदाय ने सादे झंडे को चरखाछाप तिरंगे में बदला और बाद में हम गांधी के ही हो गये, अब तक हैं, कोशिश होगी कि हमेशा रहें भी.

खेड़ेया आखिरी वाक्य भी एक लय में बोल जाते हैं कि कोशिश करेंगे कि गांधी के राह पर ही समुदाय की आनेवाली पीढ़ी भी चले और उन्हीं का होकर रहे, लेकिन उनके इस कहे मे भविष्य के प्रति एक आशंका का भाव दिखता है.


टाना भगत समुदाय के लोग नहीं बताते लेकिन यह जानकारी मिलती है कि नयी पीढ़ी का जुड़ाव अपनी इस परंपरा से उस तरह नहीं रह गया है, जिस तरह का होना चाहिए था. इसकी कई वजहें बतायी जाती हैं. एक तो ये आदिवासी समुदाय से आते हैं, आदिवासियों के बीच ही रहते हैं, जिसमें बलि प्रथा की एक महत्वपूर्ण विधि है. हालांकि टाना भगतों के प्रभाव में आकर कई आदिवासी भी अब दूध-अनाज की बली देने लगे हैं लेकिन यह संख्या बहुत कम है. दूसरा आदिवासी समुदाय में हंड़िया पीना भी एक परंपरा है, जिससे बचना नयी पीढ़ी के लिए इतना आसान नहीं. इन सबके साथ इस खास समुदाय को बचाने-बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर वह सहयोग भी नहीं प्राप्त हो सका, जिसकी दरकार थी. आजादी के इतने साल बाद नीलाम जमीन मिलने की प्रक्रिया का शुरु होना एक बड़ी विडंबना को तो बताता ही है, और भी कई चीजें हैं, जिनसे इनकी उपेक्षा का अनुमान लगाया जा सकता है. जाहिर सी बात है कि यदि नयी पीढ़ी को जोड़नेवाली कोई योजना नहीं रहेगी तो इस समुदाय का इतिहास बनना तय है. इनकी संख्या अभी कितनी है, यह पक्का नहीं लेकिन अखिल भारतीय टाना भगत विकास परिषद 44 हजार बताता है.


टाना भगतों की जमीन वापसी में अहम भूमिका निभानेवाले, जिन्हें टाना भगत भी बहुत सम्मान देते हैं और उन पर व्यापक सामाजिक शोध करनेवाले समाजशास्त्री डॉ एस नारायण कहते हैं कि बात इनकी संख्या की नहीं, इनमें संभावनाओं की है. सरकार उन संभावनाओं को नहीं देख रही है. यह गांधी के सिद्धांत सत्य, अहिंसा आदि को जीवंतता के साथ आज भी जीनेवाला दुनिया का इकलौता समुदाय है. बकौल एस नारायण, इस समुदाय की बसाहट जहां-जहां है, वहां नक्सल का प्रभाव कम हुआ है. कई नक्सली इनके प्रभाव में आकर गांधी की राह अपना चुके हैं और यह तय है कि अगर इन टाना भगतों को समूह में नक्सल प्रभावित इलाकों में ले जाकर बसाया जाए तो ये अपनी जीवनशैली, निष्ठा से नक्सल के प्रभाव कम करने में सक्षम हैं. नारायण कहते हैं कि उन्होंने इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपकर सलाह दी है, आगे क्या होता है, यह देखा जाना बाकी है.


टाना भगतों से और भी ढेरों बातें होती हैं. आखिरी में हम खक्सीटोली गांव पहुंचते हैं, जहां एक टोली में जतराटाना भगत की बड़ी प्रतिमा लगी होती है, सामने तीन चरखाछाप तिरंगे वाला बांस होता है. खक्सीटोली के बाहरी हिस्से में जाते हैं, जहां हरिवंश टाना भगत समेत 74 स्वतंत्रता सेनानी टाना भगतों के नाम का पत्थर कतार में दिखता है. वहीं टाना भगत समुदाय के लोग गांधी जयंती हर्षोल्लास से मनाते हैं. वहां अगली कतार के पत्थर टाना भगतों के साथ राजनीति का खेल बयां करती है. एक बड़ा शिलापट्ट धाकड़ आदिवासी नेता शिबू सोरेन के नाम का दिखता है, जो मुख्यमंत्री रहते हुए शिलान्यास करने आये थे. दूसरे गैर आदिवासी धाकड़ कांग्रेसी नेता व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकान्त सहाय का नाम दिखता है, जो अनावरण करने गये थे. इसी तरह कई नेताओं के नाम दिखते हैं. वहां तकली से धागा बना रहे बुधुआ टानाभगत मिलते हैं. जिरगा टाना भी भगत मिलते हैं. जिरगा कहते हैं, जिन-जिन नेताओं के नाम लगे हैं, सबने कहा था कि इसे महत्वपूर्ण स्थल बनायेंगे लेकिन अपने नाम का पट्ट लगाने के बाद इस जगह को याद नहीं किये.


टाना भगतों के साथ सत्ता-शासन और राजनीति आगे क्या करेगी, यह अब भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. टाना भगत पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के मतदाता और समर्पित कांग्रेसी कार्यकर्ता रहे हैं. इन्हें सबसे ज्यादा तवज्जो इंदिरा गांधी ने दिया था. बाद में राजीव गांधी तक टाना भगतों को कांग्रेस तवज्जो देती रही लेकिन उसके बाद जंगल में बसे टाना भगतों और दिल्ली में बैठे कांग्रेस के आलाकमानों के बीच कम्युनिकेशन गैप हुआ. लेकिन टाना भगतों को अब भी उम्मीद है कि कांग्रेस न सही, कोई और ही सही, लेकिन दिल की गहराइयों से फिर से संवाद कायम करेगे।

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