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'दधी-चिउरा उपहार अपारा, भरी-भरी कांवर चले कहारा'

खानपान की दुनिया में मशहूर देसी फास्टफूड चिउड़ा अनेकानेक नाम से जाना जाता है, अनेकानेक रूप में खाया—खिलाया जाता है. बिहार में दही चिउड़ा मशहूर है. बिहार खानपान की दुनिया में अपनी पहचान के लिए लिट्टीचोखा में लटपटा कर जितना लहालोट होता है, अगर उससे आधी उर्जा दहीचिउड़ा को अपना ब्रांड बनाने में लगता तो प्राप्त इतिहास के आधार पर ठोस तथ्यो व तर्कों के साथ ब्रांड बिहार के रूप में देश—दुनिया में जाना जाता.


चूड़ा, जिसकी धाक दुनिया में है, उसकी उत्पति है बिहार से है, वह बिहार की देन है

चिउड़ा देश के हर राज्य, हर इलाके में अलग—अलग नाम से मशहूर है. इससे न जाने कितने तरीके के व्यंजन बनते हैं? इसे खाने,खिलाने के कितने तरीके हैं? कर्नाटकवालों के बीच अवलक्की मशहूर है. गुजरातवाले पउआ, उड़िसावाले चूड़ा, आंध्रप्रदेशवाले अटुकुल्लू, तमिलनाडु और केरलवाले अवल, असमवाले सिरा, बंगालवाले चिरा, महाराष्ट्रवाले पोहे,कोंकण इलाके वाले फोवू के दिवाने हैं. ऐसे ही न जाने कितने नाम है इस एक सर्वकालिक-सर्वाधिक लोकप्रिय फास्टफुड के. खाने के तरीके तो अलग—अलग है हीं. इंदौर समेत पूरे मालवा इलाके में पोहा जलेबी मशहूर है, गुजरात—महाराष्ट्र के इलाके में पोहा फेमस है. तमिलनाडुवाले चूड़ा,दूध,चीनी नारियल,केला आदि मिलाकर अविलनान चाथू बनाकर खाते हैं तो दक्षिण में ही अविल विलाय चाथू भी बनता है, जिसमें चूड़ा के साथ दाल,काजू,बादाम,नारियल आदि मिलाया जाता है.


कोंकणवाले ठीकफोनू बनाकर खाते हैं, उड़िसावाले चूड़ा कदम्ब. और बनारसवाले चूंकि खानपान की दुनिया में कभी किसी की नकल नहीं करते, वह अपने आईटम को ही विकसित कर खाने में भरोसा रखते हैं, इसलिए वहां का चूड़ामटर ख्यात,विख्यात और कुख्यात तीनों है. बनारस में चूड़ामटर के लिए अलग मसाला बनता है और वह मसाला भी बनारसी ही बनाते हैं. इस तरह देखें तो एक चूड़ा का जलवा अलग—अलग रूप में कई जगहों पर है लेकिन दही चूड़ा मूल रूप से बिहार और उससे सटे झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश या नेपाल में ही है.


बिहार से सटे पूर्वी उत्तरप्रदेश,झारखंड,नेपाल में इसका जलवा थोड़ा अलग होता है. खाने का तरीका भी अलग. दही चिउड़ा, दूध चिउड़ा, मीट चिउड़ा, आम चिउड़ा, गुड़ चिउड़ा, सब्जी चिउड़ा, फांका के रूप में चिउड़ा, भूंजा के रूप में चिउड़ा. और भी न जाने कितने तरीके से खाने का चलन है. चिउड़ा की इस लोकप्रियता की वजह भी है. खानपान के अलावा पीढ़ियों से यह लोकपरंपरा का हिस्सा रहा है. मकर सक्रांति के साथ जितनी लोकप्रियता के साथ खिचड़ी मेला लगता है, उतनी ही लोकप्रियता बेटियों के यहां कपड़ा—लत्ता के साथ चिउड़ा—लाई आदि भेजने की रही है. और अब तो पिछले कुछ दशक से यह दही चिउड़ा बिहारी खानपान की दुनिया में नयी पहचान रखता है. सियासी खानपान की पहचान.


दहीचूड़ा का खानपान एक सियासी उत्सव जैसा भी बन गया है. चूड़ा दही का भोज सभी बड़े नेता, सभी दल देते हैं और हर बार कोई न कोई सियासी डीलिंग इस भोज में होना तय माना जाता है. ऐसा इसलिए भी कि हर साल संक्रांति के दिन ही खरवास खत्म होता है और बिहारी खरवास के दिनों में सिर्फ मन ही मन शुभ काम का खाका बनाते रहते हैं, उसे लागू करते हैं संक्रांति के दिन से ही. यानि खरवास खत्म होने के बाद.


अब जरा गौर करें तो बिहारी फूड के नाम पर सबसे मशहूर ब्रांड लिट्टी चोखा का है लेकिन बिहारी नेता कभी उतने उत्साह से, बड़ी तैयारी के साथ,ढोल बाजा बजा के, मीडिया में प्रचारित कर के लिट्टी चोखा का भोज नहीं देते,जितने उत्साह से दही चूड़ा का भोज देते हैं. यह क्यों, यह नेता भी नहीं बता पायेंगे. दो वजहें हो सकती हैं. एक तो यह कि दही चूड़ा थोड़ा आसान है. चूड़ा मिल जाता है, दही भी. बनाने वनाने का झंझट नहीं होता. एक वजह यह भी हो सकती है कि चूंकि इसका कनेक्शन एक लोकपर्व से जुड़ता है तो इसलिए भी महत्व बढ़ जाता है.


लेकिन बिहार में यह चूड़ा इतना क्यों फेमस है, कब से फेमस है, इसका बिहार से क्या खास रिश्ता रहा है, इसे वे नहीं जानते. वे यह भी नहीं जानते कि आज जिस चूड़ा का जलवा भारत के लगभग सभी राज्यों में अलग—अलग रूप में, अलग—अलग नाम से है या भारत से बाहर नेपाल, बांग्लादेश,पाकिस्तान आदि तक में इसकी हनक है, उस चूड़ा को अगर बिहारी चाहें तो आसानी से अपना दावा ठोककर खानपान की दुनिया में ब्रांड बिहार बना सकते हैं. बिहारी चाहे तो इसे अपना फूड कहकर ब्रांडिंग कर सकते हैं और इसकी संभावना भी बनती है कि यह स्थापित हो जाए.


चूड़ा का वर्णन इतिहास में कम ही आता है लेकिन तुलसीदास लिखित श्रीराम चरितमानस में इसका वर्णन साफ साफ आता है और कनेक्शन सीधे सीधे बिहार के विशेष फूड आइटम के रूप में ही जुड़ता है. श्रीरामचरितमानस के बालकांड में रामविवाह का प्रसंग है. जब राम की बारात अयोध्या से चलती है तो राजा जनक रास्ते में बारातियों के लिए कई जगह ठिकाने बनवाते हैं. तरह—तरह के खानपान का प्रबंध रहता है. लेकिन जब राम की बारात राजा जनक के अपने इलाके में पहुंचती है तो उस समय जो खास चीज बारातियों के खाने के लिए भेजी जाती या जिसका प्रबंध रहता है, वह दही चूड़ा ही होता है. इस पर तुलसीदास ने चौपाई लिखा

'दधी चिउरा उपहार अपारा, भरी भरी कांवर चले कहारा'


जानकार बताते हैं कि श्रीरामचरितमानस में इसका वर्णन खासतौर पर बिहार और नेपाल यानि राजा जनक के इलाके से ही जुड़ता है. इसे आधार बनाकर बिहार अपने दहीचूड़ा को अपने ब्रांड के रूप में स्थापित कर सकता था, कर सकता है. लेकिन इसके आसार नहीं दिखते, क्योंकि बिहार अपनी सांस्कृतिक पहचान, विशेषकर खानपान को लेकर दूसरे राज्यों की तरह कंसस राज्य नहीं है. ऐसा होता तो आज बिहार का तिलकुट, अनरसा, लाई, बताशा, लकठो, पिठा,पकौड़ी जैसे कई ब्रांड इस राज्य के पास होते.

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