• Nirala Bidesia

तिलक-मालवीय के टालने-नकारने पर चंपारण के लिए विकल्प बने थे गांधी!



निराला बिदेसिया


यूं तो गांधी हमेशा ही चरचे में रहते हैं लेकिन पिछले तीन सालों से गांधी के आयोजनों की धूम है. पहले चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के कारण और अब गांधी की 150वीं जयंती वर्ष को लेकर. गांधी को केंद्र में रखकर बात होती है तो चंपारण आंदोलन उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण अध्याय की तरह स्वाभाविक रूप से जुड़ता है. चंपारण और गांधी पर ढेरों बातें होती ही रहती हैं लेकिन कुछ प्रसंग ऐसे हैं, जिन पर बात नहीं होती.


यह सच है कि गांधी के चंपारण आने के करीब एक दशक से भी अधिक समय पहले से चंपारण में चल रहे आंदोलन के बिखर जाने के बाद उसे एक मुकम्मल स्वरूप गांधी के आने के बाद ही मिला. आंदोलन एक मुकाम तक पहुंचा. लेकिन यह भी सच है कि गांधी और चंपारण पर जब बात होती है तो इतिहास के कई प्रसंग गायब रहते हैं या उन प्रसंगों पर उस तरह से बात नहीं होती.


यह कहानी तो बार-बार आती है कि राजकुमार शुक्ल अथक परिश्रम कर, निरंतर प्रयास कर गांधी को चंपारण लाने में सफल रहे. इसके लिए वे लखनउ, कानपुर से लेकर कलकत्ता तक की दौड़ लगाते रहे. राजकुमार शुक्ल से लेकर पीर मोहम्मद मोनिस द्वारा गांधी से हुए पत्राचार का जिक्र आता है, प्रताप के यशस्वी संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की भूमिका की बात आती है. यह सब सही है लेकिन एक दूसरा पक्ष यह है कि चंपारण मे चल रहे किसानों के आंदालन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए न तो पहली पसंद गांधी थे और ना ही उन्हें बुलाने के लिए कोई योजनाबद्ध तैयारी आरंभ में थी.


गांधी की जगह चंपारण में तिलक और मदन मोहन मालवीय को बुलाने की योजना बनी थी और यह उम्मीद की जा रही थी वे आयेंगे, तभी कुछ बात बनेगी. यह योजना किसी और की नहीं बल्कि चंपारण आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार शेख गुलाब और उनके परम मित्र, आंदोलनकारी शीतल राय की थी, जो गांधी के चंपारण आने के पहले एक दशक से भी अधिक पहले समय से चंपारण के किसानों को संगठित कर आंदोलन कर रहे थे और अंग्रेजों को परेशानहाल कर रखे थे. ये शेख गुलाब ही थे जिन्होंने अपने साथ जिन्होंने शीतल राय जैसे आंदोलनकारी को अपने साथ जोड़ा, फिर दोनों के बीच गाढ़ी दोस्ती हुई और फिर दोनों ने मिलकर चंपारण में आंदोलन तो किया ही, अंग्रेजों को परेशान किया ही, खुद अस्वस्थ और लाचार होने पर राजकुमार शुक्ल को उभारने, नेतृत्वकर्ता बनाने में भूमिका निभायी.


सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में शेख गुलाब, शीतल राय आदि पर चर्चा ज्यादा इसलिए नहीं हो रही, क्योंकि लोकप्रिय किताबों में उनकी चर्चा कम है लेकिन एक समय में इन पर महत्वपूर्ण काम हुए थे वह किताब की शक्ल में लोगों के बीच आयी भी थी. 1922 में बेतिया में जन्में अशरफ कादरी उर्दू के एक मशहूर रचनाकार और अध्येता थे और उन्होंने एक महत्वपूर्ण किताब लिखी थी- ‘तहरीके-आजादी-ए-हिन्द में मुस्लिम-मुजाहिदीने-चम्पारण का मुकाम.’ कादरी साहब ने 1985 में कांग्रेस पार्टी के सौ साल होने पर पार्टी की ओर से मिली जिम्मेवारी के बाद चंपारण के आंदोलनकारियों पर विस्तृत काम किया था. शेख गुलाब की जीवनी पर अलग से काम किया था. उनके लिखे आलेख कांग्रेस के शताब्दी वर्ष पर पार्टी की स्मारिका में प्रकाशित हुए थे और बाद में चंपारण के 184 आंदोलनकारियों के बारे में उन्होंने किताब लिखी, जो मूल रूप से उर्दू में प्रकाशित हुआ और फिर बाद में 1997 में उसका हिंदी अनुवाद आया था.


कादरी खुद स्वतंत्रता सेनानी थे और पीर मोहम्मद मोनिस के करीबी थे. सत्याग्रह में भाग लेनेवाले कई और आंदोलनकारियों के करीबी थे.उन्होंने चंपारण में घूमकर शोध अध्ययन कर और सत्याग्रह में भाग लेनेवाले कई आंदोलनकारियों से बातचीत कर उद्यम के साथ किताब को तैयार किया था. कादरी अपनी किताब में लिखते हैं कि चूंकि चंपारण सत्याग्रह पर जो किताबें आयी, उसमें अधिकांश बाहरियों ने लिखा, इसलिए चंपारण के नायकों का उभार उस तरह से नहीं हो सका,उनके साथ न्याय नहीं हो सका.


इसी किताब में कादरी लिखते हैं कि 1905 से लेकर 1909 तक शेख गुलाब के नेतृत्व में पूरे चंपारण में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन होता रहा. कई जगहों पर नील की खेती बंद हो गयी. अंग्रेज अधिकारियों की हत्या भी हुई. शेख गुलाब के खास साथी शीतल राय गिरफ्तार हो गये. शेख थारू आदिवासियों को एकजुट करने थरूहट चले गये. उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने पांच सौ रुपये का इनाम और सूचना देनेवालों को सीधे कांस्टेबुल बनाने का एलान किया. शेख गुलाब खुद कोर्ट में आत्मसपर्मण कर दिये. जिस दिन कोर्ट में आत्मसमर्पण किये, उस दिन उन्हें देखने के लिए अंग्रेज अधिकारियों और सिपाहियों की भीड़ जुट गयी थी कि आखिर कौन है शेख जो तीन सालों से अंग्रेजों की पकड़ में भी नहीं आ रहा और जिसके नाम की दहशत बड़े बड़े अधिकारियों में है. बाद में जब शेख गुलाब जेल से रिहा हुए और उनके साथ उनके मित्र बाबू शीतल राय भी निकले तो दोनों अस्वस्थ थे. दोनों ने ही मिलकर राजकुमार शुक्ल को आगे बढ़ाना शुरू किया.


पहले राजकुमार शुक्ल को छपरा में कांग्रेस अधिवेशन में बोलने को भेजे. फिर राजकुमार शुक्ल को साथ लेकर कांग्रेस के अधिवेशन में तिलक और मालवीय से मिलने पहुंचे. कादरी लिखते हैं,‘‘ शीतल राय, शेख गुलाब और राजकुमार शुक्ल 1916 में लखनउ कांग्रेस अधिवेशन में पहुंचे. सबसे पहले तिलक से मिले और उन्हें हाल-हालात बताये. तिलक ने कहा कि अभी भारत के सामने बड़े-बड़े प्रश्न पड़े हैं, देश के सामने बड़े-बड़े काम हैं, हम नहीं जा सकते. इसके बाद इनलोगों ने मालवीयजी से संपर्क किया. मालवीयजी ने पूरी बात सुनी और वैसा ही जवाब दिया कि हम सबलोग हिंदुस्तान की आजादी की चिंता में हैं. हिंदुस्तान आजाद हो जाएगा तो सब ठीक-ठाक हो जाएगा. तिलक और मालवीय से ऐसे जवाब पाकर शेख गुलाब गुस्से में आ गये और उन्होंने उसी वक्त कहा कि अब किसी से अनुनय-विनय नहीं होगा, किसी से आग्रह-मनुहार नहीं होगा चंपारण चलने को. हम अपनी लड़ाई पहले से लड़ते रहे हैं, आगे भी अपने तरीके से लड़ेंगे और जब तक जान है, तब तक लड़ेंगे.


शेख गुलाब चूंकि चंपारण सत्याग्रह और आंदोलन के सूत्रधार थे, इसलिए उनकी बातों को काटना राजकुमार शुक्ल या बाबू शीतल राय के लिए इतना आसान भी नहीं था लेकिन उनका गुस्सा शांत कराया गया और राजकुमार शुक्ल, जो गांधी के बारे में जानते थे, उन्होंने गांधी की ओर दिखाकर कहा कि उनसे कहते हैं. राजकुमार शुक्ल ने गांधी को पूरी बात बतायी. गांधी उनकी बात समझ नहीं पाये. शुक्लजी तब ब्रजकिशोर बाबू वकील को पकड़कर लाये िकवे समझा दे. ब्रजकिशोर बाबू अचकन और पतलून पहने हुए थे. गांधीजी पर अच्छा प्रभाव न पड़ा. उन्होंने समझा कि यह गरीब किसानों को लूटनेवाला कोई वकील है. उन्होंने थोड़ी ही बात सुनकर कहा कि जो कहना होगा महासभा में कहिएगा. कांग्रेस के सत्र में ब्रजकिशोर बाबू ने निलहों के विरूद्ध प्रस्ताव पेश किया. राजकुमार शुक्ल ने समर्थन किया. कांग्रेस के इतिहास में पहला मौका आया जब एक ग्रामीण ने हिंदी में भाषण दिया.


अशरफ कादरी लिखते हैं कि चंपारण के इतिहास में चूंकि चंपारण के स्थानीय नायकों का उभार नहीं है इसलिए लखनउ में शेख गुलाब और शीतल राय के प्रसंग का जिक्र नहीं है लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने ही जो किताब ‘चंपारण में महात्मा गांधी’ लिखी है, उसके 79वें पृष्ठ पर साफ साफ जिक्र है कि चंपारण के निलहों और उनके रैयतों के विषय पर जांच के विषय में प्रस्ताव बनने से पहले कुछ लोग मालवीय और गांधी आदि नेताओं के पास गये. फिर उन्होंने लिखा है कि वहां से लौटते समय गांधी के साथ कुछ लोग कानपुर तक गये.’’ कादरी लिखते हैं कि राजेंद्र प्रसाद ने राजकुमार शुक्ल का नाम लिखा है और साथ में कुछ लोग लिखा है. वे कुछ लोग नहीं बल्कि बाबू शीतल राय, चंपारण आंदोलन के जन्मदाता और सूत्रधार शेख गुलाब थे, जो राजकुमार शुक्ल को आगे कर पीछे-पीछे चल रहे थे और बेतिया में बैठे दीन मोहम्मद उन सबों की यात्रा के लिए पैसे का इंतजाम कर रहे थे.


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