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झारखंड में बुद्धाकर्षण : संभावनाएं अपार, विडंबनाएं हजार

कुछ बरस पहले की बात है. जाड़े का मौसम था. एक-एक कर कुछ बौद्ध स्थलों पर जाना हुआ. वैशाली, सारनाथ, नालंदा, राजगीर, बोधगया. जाड़े का मौसम घुमक्कड़ी का भी मौसम होता है, सो, हर जगह सैलानियों की खूब आगत थी. हजारों की संख्या में. देशी तो भरे हुए थे ही. विदेशी भी कोई कम नहीं.

उस यात्रा में सबसे ज्यादा बार बोधगया ही जाना हुआ था. दो-तीन बार. विश्वशांति के लिए हुए कालचक्र पूजा के दौरान वहां रूकना भी हुआ था. उस दस दिनी आयोजन में सैलानियों का सैलाब दो लाख से अधिक की संख्या पार कर गयी थी. बोधगया में सड़कों पर इधर-उधर घूमने-फिरने के क्रम में फुटपाथ की एक चाय दुकान पर लगी पोस्टर पर नजर पड़ी थी. लिखा हुआ था- ‘ए प्लेस वेरी डिफरेंट फ्राॅम आॅल द अदर बुद्धिस्ट टूरिस्टी प्लेसेस. विजिट द मीडिएटिंग बुद्धा- जोन्हा. रांची. 6 आवर्स फ्राॅम बोधगया. इसके बाद टूर आॅपरेटर का नंबर. वेबसाइट का पता. वगैरह-वगैरह. बोधगया पहुंचनेवाले सैलानियों को रांची के पास जोन्हा तक ले जानेे की यह पोस्टरमार कोशिश सुकूनदायी थी. इसके पहले भी बोधगया में एक ऐसी ही कोशिश से वास्ता पड़ा था. वहां घूम-घूमकर क्लासिकल म्यूजिक सीडी बेचते हुए एक छोटे बच्चे के मुंह से सुना था- जस्ट इंज्वाय विद इंडियन क्लासिकल म्यूजिक, फील कुल एंड मेक मूड फाॅर इटखोरी, ए रेयर एंड रियल बुद्धा डेस्टिनी. सीडी बेचनेवाला वह बच्चा किसी ट्रैवेल एजेंट के लिए भी काम करता था. वह बोधगया आ रहे पर्यटकों को झारखंड के इटखोरी तक ले जाने के लिए मना लेने और प्रेरित करने के अभियान में लगा हुआ था. फिर उस बच्चे से मिलना नहीं हो सका, सो पता भी नहीं चल सका कि उस बच्चे के अभियान का क्या नतीजा निकला. संभव है, पोस्टरमार जोन्हा अभियान का एजेंट तेज-तर्रार रहा होगा तो कुछेक पर्यटकों को जोन्हा तक ले जाने में सफल हुआ होगा. हालांकि उस तरह की कोई खबर नहीं आयी. संभव है, कोई सफलता न मिली हो. यह सामान्य-सी बात भी है. कोई भी विदेशी पर्यटक पर्यटन स्थल पर मुकम्मल व्यवस्था बहाल होने और एक नेटवर्क बनने के पहले तक किसी ट्रेवल एजेंट से ज्यादा सरकारी सिस्टम को भरोसेमंद मानता है. पर्यटन के नाम पर, पर्यटन के बढ़ावा के नाम पर पानी की तरह पैसा बहानेवाली झारखंड सरकार की कोशिश के बगैर सीडी बेचनेवाला वह बच्चा या चाय दुकान की बगल में चिपका पोस्टर अपनी सीमा में दम तोड़ता रहेगा, यह बहुत हद तक तय-सा है. बोधगया झारखंड के पास है. वहां पहुंचनेवाले लोगों को ध्यान में रखकर झारखंड सरकार थोड़ी तैयारी भी करे तो कोई कारण नहीं कि एक सिलसिले का श्रीगणेश बेहतर संभावनाओं के साथ होगा. सीडी बेचनेवाला वह बच्चा जिस इटखोरी की ब्रांडिंग कर रहा था, वह तो बोधगया के बिल्कुल पास है. बुद्ध से गहरा रिश्ता रहा है उस जगह का. उस जगह को इत्तीखोयी भी कहते हैं. कहते हैं कि बुद्ध वहीं से खोये थे. वहीं से जंगल की राह पकड़ बोधगया पहुंचे थे. वहां शिवलिंग पर सैकड़ों बुद्ध की प्रतिमाएं देखने लायक है. इटखोरी में बुद्ध की प्रतिमाओं की एक खास शैली में निर्मित माना जाता है. इतिहासकार, पुराविद उसे इटखोरी शैली भी कहते हैं. जिस जोन्हा तक सैलानियों को ले जाने की कोशिश पोस्टर मैं कैद दिखी, उस जोन्हा के बारे में यह कहा जाता है कि यहां नदी की धार में बुद्ध ने स्नान किया था तो नदी का नाम गौतमधारा हुआ. वहां बिड़ला परिवार ने बौद्ध मंदिर व धर्मशाला बनवाये थे. इसे परे भी करें तो झारखंड के हिस्से में बुद्ध से सीधे तौर पर जुड़े एक ऐसे दुर्लभ व महत्वपूर्ण इलाका तथा व्यक्तित्व का भी इतिहास है, जो बेहद संभावनाओं से भरा हुआ है. यह बात अलग कि वह पूरी तरह गुमनाम है. बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में बुद्ध के कंकजोल प्रदेश में वर्षावास की चर्चा है. आज का संताल परगना ही तब का कंकजोल था. वहां बुद्ध के जमाने में, बुद्ध से मिले बगैर, बुद्ध के मुंह से सुने बगैर बौद्ध धर्म व उपदेशों की गहरी जानकारी रखनेवाली कंजंगला नामक भिक्षुणी रहती थी. इस गुमनाम भिक्षुणी के ज्ञान से चमत्कृत होकर खुद बुद्ध ने कंजंगला को पंडिता और महाप्रज्ञा की उपाधि दी थी. जाहिर-सी बात है काजंगला एक ऐसी व्यक्तित्व हैं, जिनके प्रति सहज ही देश-दुनिया का आकर्षण होगा. बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षण रखनेवाले काजंगला के देस में जाना चाहेंगे. बुद्ध ने झारखंड के हजारीबाग-कोडरमा की भी यात्राएं की थी. इन सभी बातों को बेहतर तरीके से बताने, आकर्षक तरीके से प्रचारित करने, सुरक्षा और सुविधा का आश्वासन देने से लाख- हजार- सैकड़ा न सही, आरंभ में दर्जन भर पर्यटकों को तो आकर्षित किया ही जा सकता है. तुरंत लाभ मिले, न मिले लेकिन देर-सवेर इलाके की तसवीर और तकदीर बदलनी शुरू होगी, यह तय है. बिहार के नालंदा, राजगीर, पावापुरी, वैशाली, बोधगया में यह साफ-साफ दिखता है. कई मायनों में. कई रूपों में. नालंदा के खंडहरों के आसपास स्वरोजगार-उद्यम के कई नयी राह खुले हैं. बोधगया के आसपास के गांवों में, जहां दो दशक पहले तक लंपटई का लंबा इतिहास रहा है, वहां स्थितियां बदल चुकी हैं. पर्यटकों की आगत और पर्यटन उद्योग की दस्तक ने नयी पीढ़ी को अनुशासित कर शराफत का पाठ पढ़ा दिया है. इस तुलना में झारखंड के पास खास तो यह भी है कि यहां के गांवों में और ग्रामीणों में लंपटई और अराजकता स्वभावतः होती भी नहीं! बिहार के बुद्ध सर्किट से जुड़ने के लिए झारखंड का पड़ोसी छत्तीसगढ़ बेकरार है. झारखंड का दूसरा पड़ोसी उड़ीसा भी. झारखंड का पड़ोसी बिहार और उत्तरप्रदेश तो पहले से ही बुद्ध सर्किट के केंद्र हैं. इन सबके बीच में झारखंड बुद्धाकर्षण का तमाशबीन बना हुआ है. झारखंड में अपार संभावनाएं हैं बुद्ध को लेकर. कंकजोल की काजंगला में ही अकेले इतनी संभावना है कि वह दुनिया को आज के संथाल तक बुला लेगी.

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