• Nirala Bidesia

जागुड़ी-जबरदाहा का नाम सुने हैं?


जागुड़ी गांव में डोकरा कलाकृति बनाती एक महिला कलाकार

धर्म के नाम पर एक दूसरे से फरियाने के लिए उकसाने वाले चंद खुराफाती मगज के लोगों को कभी संताल परगना के आखिरी छोर और बंगाल के बोलपुर से सटे इलाके के गांवों में जाना चाहिए, जहां जादुपेटिया समुदाय के कलाकार रहते हैं. एक ही घर में परिवार के सदस्यों के नाम मुसलमान, हिंदू, ईसाई... सबसे ताल्लुक रखनेवाले नाम मिलेंगे. यह समुदाय ऐसा है जो पीढ़ियों से, पुरखों की कला को सुरक्षित रखते-रखते और आगे बढ़ाते हुए कला से इस कदर एकाकार हो चुका है कि अब इसके लिए धर्म भी कला ही बन गया है.


निराला बिदेसिया


कोई चार साल पहले की बात है. अपने पत्रकार साथियों के साथ जागुड़ी गांव जाना हुआ था. झारखंड के आखिरी छोर पर बसा है यह गांव. बंगाल के बोलपुर के निकट. वही बोलपुर, जिस इलाके मंे शांतिनिकेतन आता है. दुमका शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर है जागुड़ी. फिर वहां से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी तय कर जबरदाहा गांव जाना हुआ था. जागुड़ी-जबरदाहा गांव में जाने का खास मकसद था. जादुपेटिया समुदाय के लोगों से मिलना. इस समुदाय का ताल्लुक डोकरा आर्ट से है. यह समुदाय पीढ़ियों से कलाकर्म में ही लगा हुआ है.पुराने पित्तल को गलाकर मिट्टी,मोम, धुंअन, सरसो तेल आदि मिलाकर गहने और कलाकृतियां बनाता है.


कहा जाता है कि जब से इंसानी समुदाय में खुद को साजने-संवारने की चेतना आयी, तब से यह समुदाय यही काम कर रहा है. कला से यह समुदाय ऐसा एकाकार हो चुका है कि अब करम-धरम सब कला ही है. जागुड़ी-जबरदाहा जैसे गांव में यही बात चकित करनेवाली थी. उनकी कलाओं के तेजी से मिटते जाने के दुख के बावजूद सुखद आश्चर्य की कुछ बातें थी. हम जिस जागुड़ी गांव में पहुंचे थे, वहां करीब 22 घर जादुपेटिया समुदाय के हैं. सबके घरों में भट्ठी, चाक. सब काम में तल्लीन थे. कोई नाक-कान-गले का गहना बना रहा था तो कहीं घूंघरू पर हाथ फेरा जा रहा था. सब बोलपुर के सालाना मेले की तैयारी में लगे थे. सबसे पहले हाकीम जादूपेटिया के घर पहुंचना हुआ था. उसके बाद पैगंबर, मकबूल, अरजीना, प्रहलाद जादुपेटिया जैसे लोगों से बात-मुलाकात हुई थी. ढेरों बात हुई थी. उनकी कला, कला से कमाई, कला के मिटते जाने आदि को लेकर लेकिन बात जो मन में सदा-सदा के लिए अंकित हो गयी थी, वह था इस समुदाय का धर्म.यह समुदाय सामाजिक तौर पर कला को ही मूल धर्म मानता है.


हिंदू-मुसलमान-ईसाई धर्म आदि के सम्मिलित स्वरूप वाला समुदाय बन जाना.जागुड़ी के बाद जब जबरदाहा पहुंचे थे तो वहां अलीम अली से मुलाकात हुई थी. झारखंड में 34वां राष्ट्रीय खेल हुआ था तो अलीम और उनके साथियों ने ही राष्ट्रीय खेलों के दौरान प्रतिभागियों को देने के लिए डोकरा आर्ट की कलाकृतियां बनायी थी. राष्ट्रीय खेल के शुभंकर का मोमेंटो तैयार किया था. जब हमारी मुलाकात हुई थी, उस वक्त अलीम और उनके साथ के कलाकार सरसडंगाल खदान में पत्थर तोड़ने का काम करने लगे थे. शिमला, गुवाहाटी, शिलौंग, चेन्नई, गोवा, कोलकाता जैसे शहरों में अपनी कला का प्रदर्शन करनेवाले कलाकार मजदूर बन गये थे. जागुड़ी-जबरदाहा के साथ इस इलाके में जादूपेटिया समुदाय के करीब दर्जन भर जो गांव थे,उनमें बिसरियान, ढेबाडीह, ठाकुरपुरा, सापादाहा, बिसनपुर, खेजुरडंगल, देबापाड़ा, मुजराबाड़ी, नावाडीह गांव के कलाकारों ने पुरखों के इस पेशे से तेजी से तौबा कर रहे थे या कर चुके थे.


यह सब तो उनके कला पक्ष की बात थी, जो धीरे-धीरे घुप्प अंधेरे की ओर बढ़ता हुआ सदा-सदा के लिए इतिहास बनने की राह पर अग्रसर था. दूसरी जो खास बात जागुड़ी और जबरदाहा गांव में जादुपेटिया परिवार से बात करते हुए दिखी थी, उसे जानना जरूरी है. हम पैगंबर जादुपेटिया के घर पहुंचे थे तो उनके बेटे का नाम प्रहलाह जादुपेटिया था. प्रहलाद जादुपेटिया ने अपने बेटे का नाम अहमद जादुपेटिया रखा था.हाकिम जादुपेटिया की पत्नी लालमुनी जादुपेटिया थी. एक ही घर परिवार में निजाम, मदीना, भानु, शंभू जैसे सदस्य मिले. नाजिर जादुपेटिया ने अपनी बेटी का नाम मरियम रखा था और फिर उसकी शादी एक अंसारी परिवार में की.


हमारा सवाल था कि आखिर आप किस धर्म से आते हैं? इसका जवाब सीधा-सीधा कोई नहीं दे सका था.कुछ ने कहा था कि हम मुसलमान ही हैं लेकिन जब हम जागुड़ी में गये थे तब तक वहां कोई मस्जिद नहीं थी और जबरदाहा में कुछ साल पहले ही एक मस्जिद बनी थी. हीरामन जादुपेटिया ठोस जवाब दी थी- देवता तो बस देवता होता है.हिंदू का देवता, मुसलमान का देवता, ईसाई का देवता... हम सबको मानते हैं.हम सब त्योहार मनाते हैं. हमारा धर्म कला ही है. हीरामन के बाद जादुपेटिया समुदाय के कई और लोगों ने ऐसा ही जवाब दिया था. इन्हें हिंदू या इसलाम धर्म से ज्यादा लेना देना नहीं, ये अपने मानवीय जीवन और कला कर्म को ही एक समग्र धर्म मान पीढ़ियों से जीवन गुजार रहे हैं.

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