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छठ : लोक के पर्व में सब लौकिक



छठ सामने है. छठ पर्व का खयाल जैसे ही जेहन में आता है, मन में कई दृश्य उभरते हैं. दृश्यों के उभरने से पहले मन में गीत गूंजते हैं. गीत ऐसे नहीं, जिनमें साल—दर साल प्रयोग हो रहे हों और नयापन हो.कोई नयापन नहीं. पीढ़ियों से ही गाये जा रहे कुछ चुनिंदा गीत ही. कांच ही बांस के बहंगिया... जैसे ठेठ,पारंपरिक गीत. इन गीतों में नयापन नहीं रहता लेकिन हर साल छठ में ये गीत उतनी ही ताजगी और नयेपन का बोध लिए आत्मीयता के साथ मन को झंकृत करते हैं,आस्था से एकाकार होते हैं.


आमतौर पर हर पर्व—त्योहार में हर साल गीतों में प्रयोग होते हैं, बदलाव होते हैं और वे स्वीकार भी होते हैं, लोकप्रिय भी हो जाते हैं. लेकिन छठ के गीतों के साथ अब तक ऐसा नहीं हो सका. कोशिश बहुत हुई, कोशिश जारी भी है लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पा रही. इसकी वजह है छठ का ठेठ लौकिक पर्व होना. लौकिकता की कसौटी ऐसी, जिसमें न तो शास्त्रीयता की, न उन्मुक्त बाजार की कहीं कोई गुंजाइश बनती है.


छठ के कुछ गीतों से गुजरना, पूरे लोकपर्व की प्रकृति और प्रवृत्ति को समझना है. कांच ही बांस के बहंगिया...अहो भइया दस—पांच पोखरा खुनाई द... गंगा माई के उंची अररिया... जैसे गीतों को गौर से सुनेंगे तो और कुछ नहीं होता खास इसमें. व्रत्ती या व्रत्ती का साथ देनेवाले आदित्य भगवान से या उनकी जननी सबिता माई, जिन्हें छठी माई के नाम से लोकप्रिय शैली में जाना जाता है, अपनी बात कहते हैं और अपनी कामना को व्यक्त करने के लिए तालाब, पोखरा, नदी, चिरईं—चिरगुन आदि आते रहते हैं.


छठ पर बात करते हुए छठ के गीतों से बात की शुरुआत इसलिए, क्योंकि छठ में गीत उस पर्व के प्राणतत्व की तरह होते हैं. इस पर्व में कोई कोई शास्त्रीय मंत्र नहीं चलते बल्कि गीत ही मंत्र हो जाते हैं. और आरंभ में ही गीत पर बात इसलिए भी, क्योंकि पीढ़ियों से, साल—दर—साल यह पर्व बता रहा है कि अपने अराध्य या ईश्वर से संवाद करने के लिए देवभाषा संस्कृत में शास्त्रीय मंत्र अनिवार्य तत्व नहीं है, बल्कि अनगढ़ लोग, आम आदमी अपनी-अपनी जबान में अपने अराध्य से, ईश्वर से सीधा संवाद कर सकता है, अपने मन की बात कह सकता है.


खैर, यह तो छठ गीतों की बात हुई. छठ को गीतों से इतर देखें. छठ को सोचते ही मानस में कई दृश्य भी उभरते हैं, एक आकार लेते हैं. नदी,पोखर,तालाब, फल,सूप,दौरा,ठेकुआं, गन्ना, अदरख, सुथनी, निंबू, हल्दी आदि—आदि. यानी हर चीज प्रकृति और सृष्टि से जुड़ा हुआ.


एक सूप का डाल कभी देखेंगे तो मालूम चलेगा कि कितने तरह के फल आदि उसमें सजाये जाते हैं. अब इतनी तरह की खेती गांवों में भी नहीं होती. कैश क्रॉप का जमाना है, फटाफट खेती का जमाना है, इसलिए हिंदी इलाके के एक बड़े हिस्से में खेती की वेरायटी भी खत्म हो गयी है. धान, गेहूं, कुछ सब्जियां आदि, इतने में ही खेती सिमटती जा रही है. लेकिन छठ के लिए ही सही, खेती की वेरायटी बनी रहती है. छठ ने भी एक बाजार बनाया है, तो वह बाजार भी खेती के विविधता को बनाये—बचाये रखने का एक यत्न ही है. नदी, पोखर, कुआं, तालाब आदि के अस्तित्व को बचाये—बनाये रखने का यत्न है.


आखिरी में इस पर्व में समानता और सामूहिकता के भाव पर गौर करें. समानता या सामूहिकता का यह भाव छठ को सबसे विशिष्ट और खास बनाता है. एक घाट, एक तरीके का प्रसाद, किसी की कोई विशिष्टता नहीं, किसी से प्रसाद लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं... यह समानता और सामूहिकता इसकी पहचान रही. इसे तोड़ने की कोशिश भी कई बार हुई. अलग-अलग तरीके से. कई ऐसे पंचतारा होटल हुए, जिन्होंने छठ के पैकेज देने शुरू किये कि आप घर की चिंता ना करें. सीधे परदेश से आये, हमारे यहां बनाय खाय से लेकर खरना तक का प्रबंध रहेगा. कुछ लोगों ने ऐसा करने की शुरुआत की. यह प्रयोग एक साल ही चल सका. ऐसे कोई विशिष्ट प्रयोग छठ में चल नहीं सकते, क्योंकि छठ एक पारंपरिक लौकिक त्योहार या पर्व है.


अनगढ़ मानस द्वारा बना-बनाया इसका फ्रेम इसलिए इतने सालों से नहीं बिखर पा रहा या बदल पा रहा, क्योंकि यह लौकिक है. यह परलौकिक या शास्त्रीय होता तो अब तक आनलाइन छठ से लेकर विशिष्ट छठ की शुरूआत हो चुकी होती. इस पर्व से तसवीरों में दिखनेवाले नदी, पोखर, तालाब, गन्ना आदि से काम चलाया जाने लगता.


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