• Nirala Bidesia

गुड़ही मिठाइयों के अच्छे दिन लौट आये हैं


निराला बिदेसिया


कुछ सुगर बीमारी का डर, कुछ चीनी खाने से मोटापा बढ़ने का खौफ. ऐसे में गुड़ के अच्छे दिन लौट आये हैं. और गुड़ के अच्छे दिन आये हैं तो गुड़ही मिठाइयों के भी खूब अच्छे दिन आ गये हैं. गुड़ के नाम पर पहले एकाध मिठाइयों का ही जलवा रहता था. एक तो लकठो,जिसके अच्छे दिन कुछ सालों से खत्म हो गये हैं और अब सिर्फ ठेले तक सिमट कर रह गया है. दूसरा चंपारण के इलाके का गुड़ का गोटी मशहूर रहा, लेकिन वह इतने वर्षों बाद भी अपने इलाके से बाहर मशहूर नहीं हो सका. तीसरा गुड़ का बताशा भी जलवे में रहा लेकिन अब तो बताशा नामक मिठाई के ही बुरे दिन हैं तो गुड़ का बताशा कम ही चलता है.


अब गुड़ की दूसरी मिठाइयों के अच्छे दिन बिहार में आये हैं. गुड़ का रसगुल्ला, गुड़ का खुरमा,गुड़ का लड्डू. और भी कुछ मिठाइयां,लेकिन इनमें सबसे ज्यादा जलवा लड्डू का ही बढ़ा है. एक समय था, जब बिहार में गुड़ही लड्डू के दो—तीन केंद्र ही होते थे. एक रोहतास जिला का चेनारी, दूसरा औरंगाबाद जिले का अंबा और तीसरा ब्रह्मेश्वरधाम मंदिर. और भी कुछ जगह होंगे लेकिन मशहूर यही रहें लेकिन इन जगहों पर भी कोई अनेकानेक दुकानें नहीं थी कुछ साल पहले तक. हालिया वर्षों से इन जगहों पर गुड़ के लड्डू की दुकानों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है और अब तो इन जगहों से मामला आगे बढ़ चुका है. अब इन जगहों से कई जगहों पर गुड़ के लड्डू भेजे जाते हैं और छोटे—छोटे वेंडर गुड़ का ही लड्डू बेचकर मिठाईवाले कहलाते हैं.


तो क्यों जलवा बढ़ता जा रहा है गुड़ही लड्डू का? क्या सिर्फ चीनी से दूरी बनाने या चीनीया बीमारी के डर से नहीं. यह एक कारण तो होगा ही लेकिन दूसरे भी कई कारण हैं. एक तो यह एकदम अलग स्वाद देता है. मजेदार टाइप. दूसरा एक प्रमुख कारण यह कि यह आज भी सबसे बेस्ट क्वालिटी का 120 रुपये किलो मिल जाता है. सबसे बेस्ट क्वालिटी का मतलब हुआ चेनारीवाला. बेसन बुंदीवाला. बेसन का महीन बुंदी, गुड़ का पाग और उपर से तील का बुरादा. इसे बेस्ट, इसकी मांग के आधार पर कहा गया. चेनारी स्टाइल गुड़ लड्डू अब सासराम,कुदरा से लेकर दूसरी जगहों पर मिलता है, बनता है. एक ब्रांड सा बनता जा रहा है धीरे—धीरे. वैसे ही जैसे एक समय में गया में ही मिलनेवाला तिलकुट आज पूरे पुरबिया इलाके के हर छोटे—बड़े हाट—बाजार में मिलता है, बनता है और प्राय: जगह उसे गयावाले ब्रांड के नाम से ही बेचा जाता है.


चेनारीवाला गुड़ही लड्डू भी आहिस्ते—आहिस्ते उसी राह पर है, जबकि दूसरी जगहों के गुड़ही लड्डू अभी अपने दायरे का विस्तार अपने ही शहर या हाट में अधिक से अधिक दुकानों की संख्या बढ़ने के रूप में कर रहे हैं. गुड़ही लड्डू बनानेवाले मनीष से बात होती है. उनसे हम पूछते हैं कि क्या यह भी तिलकुट की तरह का ही मिठाई हो जायेगा क्या कि जिसे सिर्फ कारिगर बनायेंगे और जो सिर्फ बाजार में ही मिलेगा? जिसे घर में बनाना बहुत मुश्किल होगा? मनीष मुस्की मारते हुए कहते हैं कि कुछ सालों बाद देखिएगा कि यह बिहार में घर—घर में बनना शुरू होगा. एक तो गुड़ को लेकर लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है इसलिए. दूसरा इसलिए कि यह घर में बनेगा तो अधिक से अधिक 50 रुपये में एक किलो से अधिक अभी के समय में तैयार हो जाएगा. और तीसरी सबसे बड़ी बात यह कि यह बनाना बहुत आसान है.


मनीष ही बताते हैं कि बिहार में दो तरीके के गुड़ही लड्डू मशहूर हुए हैं. एक चौरेठ वाला यानी चावल वाला. दूसरा बेसनवाला. चौरेठवाला बनाने का तरीका यह है कि कच्चे चावल को भीगो दीजिए. उसे पीस दीजिए. फिर उसकी बुंदी छानिए. गुड़ का पाग तैयार कीजिए और फिर उसे मिलाकर लड्डू बनाइये. चौरेठ वाले लड्डू को बांधने से पहले सौंफ—तील भी डाल देते हैं उसमें. दूसरा है बेसन बुंदी वाला. बेसन की महीन बुंदी छानिए. गुड़ की चाशनी तैयार कीजिए. उसमें थोड़ा नारियल बुरादा, कटा हुआ किसमिस, तील मिला दीजिए. फिर उसे लड्डू की तरह बांध दीजिए. मनीष कहते हैं कि बहुत आसान है यह बनाना लेकिन अब लोग घर में बनाते नहीं तो सब मुश्किल ही लगता है. लेकिन कितने दिन?

अब तो गुड़ लड्डू के वैसे—वैसे ग्राहक आते हैं जो पूछते हैं कि शुद्ध घी का है क्या? शुद्ध घी का बनता है क्या? शुद्ध घी का मिलेगा क्या? हम ऐसे लोगों को यह कहकर तो माफी मांग लेते हैं कि नहीं रिफाईन से ही बनाते हैं हमलोग लेकिन यह कहकर माफी मांगते हुए दिमाग में चलते रहता है कि कुछ दिनों बाद यह गुड़ का लड्डू भी 400 रुपये किलो होगा. देशी घी ब्रांड के नाम पर. तब दो ही चारा होंगे, या तो 400 में लीजिए या फिर शुद्धता चाहिए और मनजोग तो घर में बनाइये.


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