• Nirala Bidesia

खिचड़ी बोले तो खिचड़ी

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नेशनल फूड बनने के बाद अब हर साल खिचड़ी के त्यौहार पर खिचड़ी के साथ खेल होता है

निराला बिदेसिया


खिचड़ी अब राष्ट्रीय फूड है. खिचड़ी जब से राष्ट्रीय फूड बनी है, तब से बड़े नामदार शेफों—खानसामों के फेरे में पड़ गयी है. शेफ अब एक बार में इतना, एक बार उतना खिचड़ी बनाकर रिकार्ड बनाने के फेर में रहते हैं. खिचड़ी की मुश्किल इतनी नहीं. पीढ़ियों से सामान्य लोगों के संग संगत—यारी रखनेवाली खिचड़ी अब राजनीति के हत्थे भी तेजी चढ़ रही है.


खिचड़ी के बारे में कौन नहीं जानता कि खानपान की दुनिया का एक ऐसा शब्द, जो न जाने कितने रूपों में, कितने तरीके से इस्तेमाल होता है. गुपचुप तरीके से, अंदरखाने में होनेवाली बातों को खिचड़ी पकना या पकाना ही कहते हैं. किसी काम में विलंब हो या टालू रवैया हो तो बीरबल की खिचड़ी मुहावरा ही है. और भी न जाने कितने तरीके से, किस—किस रूप में खिचड़ी का प्रयोग होता रहा है. शनिवार शनि भगवान, हनुमानजी और खिचड़ी, इन तीनों की लोकप्रियता समान है.


सब दावा करते हैं कि खिचड़ी तो बस हमारे यहां की ही चीज है,असली खिचड़ी तो हमही खाते हैं. जम्मू कश्मीर में मोंग खेचिर, पंजाब में तुर दाल खिचड़ी, राजस्थान में कठियावाड़ी खिचड़ी, गुजरात में वघरेली खिचड़ी, महाराष्ट्र में बलाचा खिचड़ी, गोवा में स्वीट खिचड़ी, कर्नाटक में खारा पोंगल, केरल में मठान खिचड़ी, आंध्रप्रदेश में पुलगाम, तमिलनाडु में वेल पोंगम, ओड़िसा में मीठा खेचुरी, मिजोरम में ब्लैकराइस खिचड़ी,नागालैंड में गाल्हो, असम में खर,मेघालय में जादो, बनारस में तहरी का बारहमासा जादू रहता है. सबमें थोड़ा—थोड़ा फर्क जरूर है लेकिन मोटे तौर पर सब मौसेरे—ममेरे—चचेरे भाई की तरह ही हैं. इन सबके साथ खिचड़ी के चार यार— चोखा,चटनी,घी,आचार का मंत्र सालों भर चलता है.


हर जगह खिचड़ी मेले की अपनी कहानियां है, अपना महात्तम. लोगों का मन तो अपने पारंपरिक खिचड़ी मेले में मगन है,लेकिन मीडिया इन दिनों पारंपरिक खिचड़ी मेले से ज्यादा दूसरे किस्म के खिचड़ी मेला की चर्चा में है. इस बार सत्ताधारी पार्टी भाजपा समरस खिचड़ी पार्टी की तैयारी में है. बताया गया है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में इस समरस खिचड़ी को खाने के लिए 50 हजार लोग देश भर से जुट रहे हैं. खिचड़ी बनाने के लिए 20 फीट व्यास और 6 फिट गहरा बर्तन मंगाया गया है. कहा जा रहा है कि इस बार का समरस खिचड़ी पिछले रिकार्ड को तोड़ेगा. पहला विश्व रिकार्ड एक बार में 918.8 किलोग्राम खिचड़ी बनाने का था, जिसे नवंबर 2017 में वर्ल्ड फूड इंडिया फेस्टिवल में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और मशहूर शेफ संजीव कपूर के नेतृत्व में बनाया गया था. इस रिकार्ड को 275 किलो चावल से नागपुर के चिटनीस पार्क में एक बार में 3,000 किलो खिचड़ी पकाकर तोड़ डाला गया था. इसे तैयार करने के लिए 275 किलो चावल, 125 किलो मूंग की दाल, 150 किलो चना दाल, 2000 लीटर पानी, 50 लीटर दही, 150 किलो विभिन्न प्रकार की सब्जियां, 30 किलो हरा धनिया, 100 किलो देशी घी, 35 किलो नमक और 50 किलो मूंगफली के तेल का इस्तेमाल किया गया था. खिचड़ी के नाम पर आजकल ऐसे ही खिचड़ीबाजी का खेल शुरू हुआ है. ऐसी ही छोटी—छोटी कोशिशों को कर के अपनी अपनी पीठ थपथपायी जा रही है कि हम तो खिचड़ी को लेकर रिकार्ड बना रहे हैं. उन्हें शायद खिचड़ी का इतिहास नहीं मालूम, शायद इसलिए ऐसा.


गोरखपुरवाले गोरखपंथियों को मालूम चल जाये कि खिचड़ी अब वल्र्ड रिकार्ड बनाने का भी औजार है तो वे कल ही सारे रिकार्ड तोड़ दें, क्योंकि वे खुद को खिचड़ी का अविष्कारक मानते हैं. वहां लोग कहते हैं कि जब खिलजी आक्रमण किया तो उस समय जो नाथ योगी थे, उनका जम के मुकाबला करते थे. दिन भर लड़ते और लड़ते—लड़ते थक जाते तो रात में भोजन नहीं बना पाते. बिना भोजन अगले दिन लड़ना संभव नहीं हो पाता था. आखिर में एक दिन योगियों ने चावल—दाल—सब्जी सबको एक साथ पकाना शुरू किया. कहते हैं कि बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रख दिया. गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ मंदिर के पास ही खिचड़ी मेला जब लगता है तो वह एक दिन में खत्म नहीं होता, कई दिनों तक चलता है. यहां खिचड़ी ही प्रसाद चढ़ता है और चलता भी है.वैसे गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी का प्रसाद कोई अकेला नहीं है. मंदिरों में खिचड़ी का प्रसाद कई जगहों पर लोकप्रिय है, यह तो सब जानते हैं.


खिचड़ी के अविष्कारक गोरखपंथी ही थे या यह कहां से आया, इसके बारे में स्पष्ट नहीं लेकिन यह बात पक्की है कि यह सदियों से चर्चा पाता रहा है.खिचड़ी के बारे में कहा जाता है कि यह संस्कृत के खिच्चा शब्द से बना है. खिच्चा यानि चावल और विभिन्न प्रकार की दाल को मिलाकर बननेवाला खाद्य पदार्थ.इस खिचड़ी की चर्चा कोई आज से नहीं होती. ग्रीक राजदूत सेलुकस जब भारत आया तो लिखा कि इंडिया में चावल और दाल से बना खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय है. 13वीं सदी में भारत आये इब्न बतूता ने भी इस खिचड़ी की चर्चा की. उसने लिखा कि भारत में चावल और मूंग की दाल से बननेवाला खाद्यपदार्थ लोकप्रिय है.


15वीं सदी में भारत आने वाले रूसी यात्री अफानसी निकितीन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में खिचड़ी की लोकप्रियता के बारे में बताया. और अगर मुगल काल में जाये तो खिचड़ी का जलवा भी शहंशाह की तरह ही था. अबुल फजल ने आईन-ए-अकबरी में खिचड़ी का जिक्र दिल खोलकर किया है. फजल ने सात तरीके बताये हैं कि खिचड़ी कैसे—कैसे बनती है.और कहा तो यह भी जाता है कि मुगलों में ही एक मशहूर राजा जहांगीर को खिचड़ी सबसे ज्यादा पसंद थी. खिचड़ी इन दिनों अपने ऐसे ही इतिहास को याद करते हुए वर्तमान में अपने साथ छोटे—छोटे प्रयोग कर बड़ा नाम पानेवाले, बड़े—बड़े लोगों की ख्वाहिशों के साथ हैरानी—परेशानी दौर में है. खिचड़ी को डर है कि उसके साथ इतना प्रयोग ना हो जाये, वह कहीं इस तरह का ब्रांड न बन जाये कि सबकी पहुंच से निकल, विशिष्टताबोध की शिकार हो जाये. जैसे कई लोकप्रिय पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों के साथ हो चुका है.


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