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कहानी 'विश्वमित्र' अखबार की, कहानी मूलचंद अग्रवाल की

बेशक पत्रकारिता में नवाचार प्रयोग हुए हैं. हो रहे हैं. लेकिन जितने नवाचारी प्रयोग नहीं हो रहे, उससे ज्यादा शोर का दौर है यह. हर प्रयोग को 'पहली बार—पहली बार' कहने का फैशन और चलन भी है. चाहें तो इसे आत्ममुग्धी दौर भी कह सकते हैं. डिजिटल मीडिया का दौर शुरू होने से थोक के भाव से मीडिया संस्थान खड़े हुए हैं और कुछेक को छोड़कर प्राय: परजीवी मोड में चलते हैं. प्राइमरी खबर के लिए टकटकी लगाकर देखते रहते हैं और खबर मिलते ही उसका विश्लेषण कर हमारा सबसे बढ़ियां—हमारा सबसे बढ़ियां का पाठ होता है.

इस प्रयोग में कोई दिक्कत भी नहीं लेकिन यह कोई नवाचारी प्रयोग नहीं. अगर इस तरह के प्रयोग को इनोवेशन कहते हैं तो हम पत्रकारों को इस तरह के इनोवेशन के पितामह को भी जानना चाहिए. हिंदी पत्रकारिता में उनकी कभी बात नहीं होती लेकिन उन्होंने अपने समय में अपने साहस और परिश्रम से एक नया रास्ता बनाया था, जिसका विस्तार आज दिखता है. यह अलग बात है कि उस विस्तार की नाव पर सवारी करनेवाले कभी उस प्रयोग की चर्चा नहीं करते. वह प्रयोग था विश्वमित्र अखबार का, जिसका प्रकाशन आज भी होता है. कलकत्ते का एक प्रमुख हिंदी अखबार है. विश्वमित्र की बात उस समय की है , जब हिंदी पत्रकारिता में ‘भारत मित्र’ का सितारा चमक रहा था. कलकत्ते से वह प्रकाशित होता था. सर्वसाधन संपन्न, जमा—जमाया दैनिक था भारत मित्र. निर्भिक नीति एवं गंभीर विचार के कारण हिंदीभाषियों पर उसका एकाधिकार था.अंबिका प्रसाद वाजपेयी उसके संपादकीय विभाग से विदा ले चुके थे और उनकी जगह लक्ष्मणनारायण गर्दे संपदक बने थे. तब पत्रकारिता के बड़े नाम.

उन्हीं दिनों कलकत्ते की पत्रकारिता में एक और प्रयोग हुआ. वह प्रयोग हुआ तो कलकत्ते में लेकिन पूरे देश की पत्रकारिता में वह एक नायाब प्रयोग था. पूरे हिंदी पत्रकारिता में. कलकत्ता के एक अग्रवाल युवक ने भारत मित्र के मुकाबले में विश्वमित्र नामक दैनिक निकालना शुरू किया. उस युवक का नाम था मूलचंद्र अग्रवाल. जब भारतमित्र के मुकाबले विश्वमित्र निकालने की शुरुआत मूलचंद अग्रवाल ने की तो लोगों ने उनको सनकी कहा. कुछ ने तो यह माना कि वह लखपति के लाडला होंगे तो पैसा फूंक रहे हैं.

उस समय मूलचंद अग्रवाल ठीक से जवानी में भी नहीं पहुंचे थे. तरूण ही थे. मामूली घर के थे. निर्धन परिवार से लेकिन साहसी बहुत थे. सादा जीवन गुजारते थे. कम उम्र में वह भारतमित्र के मुकाबले अखबार निकालना शुरू किये थे. वह भी दैनिक अखबार. दैनिक अखबार वही चलता है, जिसमें ताजी खबरें हो. उन दिनों रायटर और एसोसिएट प्रेस की खबरें खरीदना विश्वमित्र अखबार या मूलचंद अग्रवाल से औकात की बात नहीं थी. लेकिन मूलचंद ने बड़ी खूबी से इसका रास्ता निकाल लिया था. उनके एक साथी थे मातासेवक पाठक. पाठकजी सबेरे ढाई तीन बजे ही विश्वमित्र के दफ्तर में आ बैठते थे. ऐसा प्रबंध कर लिया गया था कि प्रेस से छपकर बाहर निकलते ही स्टेट्समैन की काॅपी शीघ्र से शीध्र विश्वमित्र कार्यालय में पहुंच जाया करे. उसके आते ही पाठकजी भूखे भेड़िये की भांति टूट पड़ते और ताजे समाचारों को छांटने लगते. फिर तेजी से जरूरी खबरों का अनुवाद आरंभ हो जाता और सबेरे विश्वमित्र ताजे से ताजे समाचारों से सुसज्जित होकर जब बाजार में पहुंचता तो लोग देखकर दंग रह जाते और सोचने लगते कि साधनहीन विश्वमित्र को ताजी खबरें मिलती है तो कैसे और कहां से?


विश्वमित्र अपने संचालक की विलक्षण सूझ, प्रतिभा एवं लगन के सहारे आगे बढ़ता गया. मूलचंद ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिखाया कि एक निर्धन और साधनहीन युवक भी साहस, उत्साह,क्रियाशीलता और प्रबंधकीय कौशल से क्या नहीं कर सकता? बहुत कम समय में मूलचंद अग्रवाल ने अखबार के तीन संस्करण शुरू कर दिये. एक साथ तीन-तीन स्थानों से तीन संस्करण. वह भी तब जब बंगाल जैसे राज्य से स्टेट्समैन और अमृत बाजार पत्रिका जैसे मशहूर अखबार भी के दो-दो संस्करण निकलते थे. एक का कलकत्ता और नई दिल्ली से तथा दूसरे का कलकत्ता और प्रयाग से, पर विश्वमित्र दैनिक के तीन संस्करण कलकत्ता, बंबई और नई दिल्ली से निकलने लगा था. इसके अतिरिक्त विश्वमित्र के साप्ताहिक और मासिक संस्करण भी निकलते थे. और खूबी यह थी कि सब के सब हिंदी के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं से टक्कर ले सकते थे. मूलचंद अग्रवाल ने अपनी जीवनी भी लिखी थी. एक पत्रकार की आत्मकथा नाम से. अब वह किताब मिलती नहीं लेकिन पत्रकारिता के छात्रों को ऐसे भारतीय पत्रकारों की कहानियां भी पढ़ायी जानी चाहिए. पत्रकारिता के कोर्स में बड़े बदलाव की जरूरत है ताकि वह इतिहास को जान वर्तमान में साहस दिखाते हुए भविष्य का रास्ता बना सके.

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