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मोती बीए : एक तरानेबाज का फसाना


भोजपुरी के पहले सिने गीतकार मोतीलाल उपाध्याय उर्फ मोती बीए

भोजपुरी के पहले सिनेगीतकार, पांच भाषाओं में एक समान अधिकार रखते हुए साधकर रचनेवाले कवि मोती बीए को उनकी जन्मशताब्दी पर याद करना लोकरचनाधर्मिता के स्वर्णीम दौर के अध्यायों का पुनर्पाठ है. मोती बीए ने हिंदी सिने संगीत जगत में भी महत्वपूर्ण योगदान ​दिया, हिंदी कविताई की दुनिया में भी लेकिन अगर सिर्फ भोजपुरी की ही बात करें तो उन्हें याद किया जाना, उनके व्यक्तित्व—कृतित्व को उभारना कई छद्म और मनगढ़ंत सवालों को खत्म करता है. छद्म और मनगढ़ंत सवाल यह कि आज अनेकानेक लोग खड़े होकर कहते हैं कि मुंबई में भोजपुरी उनकी वजह से पहुंची, भोजपुरी को उन्होंने अपार विस्तार दिया जबकि मोती बीए आजादी के एक साल बाद यानी 1948 में ही दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की फिल्म नदिया के पार के लिए आठ गीत लिखे थे, आठों भोजपुरी में. यह वह समय था जब भोजपुरी सिनेमा बनाने की कहीं बात भी नहीं हो रही थी. भोजपुरी सिनेमा तो लगभग दो दशक बाद बना.


निराला बिदेसिया

यह साल मोती बीए की 100वीं जयंती का साल है. मोती बीए, जिनका पूरा नाम तो मोतीलाल उपाध्याय था लेकिन वे मशहूर हुए मोती बीए के नाम से.मोती बीए, जिन्होंने पढ़ाई तो एमए तक की कर ली, पीएचडी तक पहुंच गये लेकिन बीए करते ही सृजन की दुनिया में ऐसी धाक जमी कि नाम के साथ डिग्री लग गयी और फिर आजीवन वह मोती बीए के नाम से ही जाने जाते रहे. ऐसी ढेर बातें मोतीलाल के व्यक्तित्व—कृतित्व से जुड़ाव रखनेवाले हैं लेकिन सबसे पहला सवाल तो यही कि यह मोती थे कौन? पहचान का सवाल ही आरंभिक सवाल होना अजीब—सा है, लेकिन विस्मृति के गर्भ में चले गये मोतीलाल के लिए यह सवाल बनता भी है.


मोटे तौर पर उनका आरंभिक परिचय यह कि उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के बरेजी आबगीर गांव में उनका जन्म हुआ. गांव में लगे आबगीर शब्द के बारे में मोती बीए ने खुद अपने आत्मकथ्य में बताया है. जिस तरह से आलमगीर का मतलब होता है—दुनिया का मालिक, उसी तरह आबगीर का मतलब होता है— पानी का मालिक.गांव का नाम तो स्पष्ट है लेकिन जन्मतिथि को लेकर दुविधा. मोती बीए कहते थे कि उनकी कुंडली बनी थी लेकिन चार साल बाद चोर चुरा ले गये थे. मेरा स्वभाव बसंत की तरह रहा, मन फागुन की तरह तो मां कहती थी कि फागुन के आसपास का ही था मैं. साल 1919 था, यह तय है. अंग्रेजी में उनकी जन्मतिथि निर्धारित हुई एक अगस्त.कद—काठी में छोटे—नाटे थे तो बचपन से ही पुकारू नाम नन्हकू पड़ा. हाईस्कूल से निकलने के बाद इंटर कालेज आते—आते नन्हकू नाम लिटिल में बदल गया और फिर बीए होते—होते या होने के बाद मोती बीए के रूप में, जो जीवन के आखिरी दिन और, दुनिया से जाने के बाद भी रह गया.यह तो उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी है. इस जानकारी में संघर्ष की वह कहानियां समाहित नहीं की जा रही, जिससे बचपन से ही गुजरते हुए,एकाकार होते हुए मोती बीए अपने सृजन की धार को मजबूत करते रहे.



तब अगला सवाल यह कि आखिरी मोतीबीए ने ऐसा क्या किया, जिसकी वजह से उन्हें कालजयी या काल से परे, दोनों श्रेणी के नायकों में शामिल माना जाए? अगर मोती बीए के कृतित्व को देखते हैं तो उनकी पहचान की कई रेखाएं एक साथ बनती हैं. वह एक शानदार कवि—गीतकार थे. अपने जीवन में करीब 65 साल तक सक्रियता के साथ हिंदी,संस्कृत,उर्दू,अंग्रेजी और अपनी मातृभाषा भोजपुरी में रचनेवाले उत्कृष्ट और लोकप्रिय कवि. आजादी की लड़ाई के परवाने, जो कई बार जेल गये. इन सबके साथ पत्रकार भी. दैनिक आज और दैनिक संसार में पत्रकारिता की, उच्च पदों तक भी पहुंचे. यह सब पहचान तो एक तरफ, उनकी दूसरी बड़ी पहचान सिने—जगत में रही. सिर्फ पहचान नहीं, एक समय में धाक,धमक और हनक भी. 1944 से 1952 तक बतौर गीतकार फिल्मी दुनिया का हिस्सा रहे. लाहौर से बम्बई तक सक्रिय रहे. इतने कम समय में ही उनके गीतों का जादुई असर रहा. लेकिन बाद में कुछ घर की स्थितियां, कुछ मन का मौज कि मोती बीए फिल्मी दुनिया के मोह—माया को एक झटके में छोड़कर अपने गांव लौटे और फिर अपने इलाके के ही एक इंटर कालेज में प्राध्यापकी करते हुए जीवन गुजार दिये.


मोती बीए के फिल्मी दुनिया से जुड़ने की कहानी भी दिलचस्प रही.1934 की बात है. मोतीलाल गोरखपुर के एंड्र्यूज कालेज में इंटर की पढ़ाई करते हुए कविता लिखने लगे थे. तब महादेवी वर्मा के छोटे भाई गोरखपुर से हस्तलिखित पत्रिका निकाला करते थे. मोतीलाल की पहली कविता उसी पत्रिका में छपी.उस कविता की पहली पंक्ति थी—

अरी सखी घुंघट के पट खोल.

है मेरा ​उद्विग्न हृदय, सुनने को तेरा बोल.

अरी सखी, घुंघट के पट खोल.


फिर वह बनारस में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई करने आ गये. 1936 से 1939 तक बनारस रहे. बनारस में रहते हुए प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल,नंददुलारे बाजपेयी, निराला,पंत, सोहनलाल द्विवेदी जैसे लोगों से संपर्क रहा, सबके स्नेहपात्र बने रहे. कविताएं लिखते रहे. लिखते तो कई भाषाओं में थे, लेकिन अपनी मातृभाषा भोजपुरी से विशेष अनुराग था. कविताएं छिटपुट छपती रही लेकिन मोतीबीए का उत्साह ठंडा होता गया. स्नातक की पढ़ाई के बाद वह अपने गांव लौट गये. पढ़ाई भी छुट गयी. 1939 में जब गांव लौटे, तब बहुत पहले भेजी हुई उनकी एक कविता आज अखबार के पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई. मनोबल बढ़ा. फिर बनारस वापस आ गये. बीएचयू में एमए में दाखिला लिये और साहित्य की ओर मन रमता गया.


उन दिनों बनारस में बेढब बनारसी के यहां साप्ताहिक काव्य चर्चा होती थी. उस गोष्ठी का दूर—दूर तक नाम था. उसमें देश के चुनिंदा कवि आते थे. एक नये कवि और एक पुराने कवि, एक साथ काव्य पाठ करते थे, कविता पर बात करते थे. मोती बीए भी उसमें जाने लगे. एक दिन हरिवंश राय बच्चन के सामने उन्होंने पाठ किया. हरिवंश राय बच्चन ने कहा कि तुम्हारी सहजता ही तुम्हारी विशिष्टता है. मोती बीए शहर के कवि सम्मेलनों में जाते रहे. एक दिन अपने गुरू पंडित सिताराम चतुर्वेदी की ओर से आयोजित काव्य सम्मेलन में गये. उस काव्य सम्मेलन में लाहौर के पंचोली आर्ट फिल्म कंपनी के मालिक भी वहां आये थे. वह नये गीतकार की तलाश में वहां पहुंचे थे. मोती बीए को सुनते ही उन्होंने कहा कि तुम लाहौर चलो.


मोती बीए लाहौर जाने को मन ही मन तैयार, लेकिन उनके गुरुओं ने कहा कि अभी पढ़ाई पूरी कर लो. मोती बीए उधेड़बुन में रहे लेकिन एमए की पढ़ाई पूरी करते ही लाहौर चले गये. लाहौर जाने की बारी आई तो पैसे का अभाव हुआ. गाजीपुर के साथियों ने पैसे जुटाये,कपड़ा आदि का इंतजाम किया. मोती बीए लाहौर पहुंचे. पंचोली आर्ट फिल्म के मालिक सेठ दलसुख एम पंचोली से मुलाकात के लिए कंपनी के सहायक निर्देशक सरकार रणजीत मोती बीए को लेकर गये. सेठ गुजराती थे. उन्होंने मोती बीए से उनकी मशहूर रचना— रूप भार से लदी तू चली, तू चली—समग्र सृष्टि ही हिली... सुना. सेठ प्रभावित हुए. फिर अपनी कार में बिठाकर स्टुडियो ले गये. मोती बीए पंचोली आर्ट फिल्म से बतौर गीतकार जुड़ गये.300 रुपये महीने का पगार तय हुआ. उन्होंने 'कैसे कहूं' फिल्म में दो गीत लिखे. गीत को जोहरा बेगम और डी.बातिश का स्वर मिला. गीत मशहूर हुआ.


यह वह समय था जब लाहौर में तीन ही हिंदी के गीतकार रहते थे. एक मराल शास्त्री, दूसरे करूण जी और क्षेत्रचंद्र सुमन. चौथे मोती बीए वहां पहुंचे. बाद में वह बम्बई चले आये. बम्बई में मास्टर विनायक राव मिले. उन्होंने सुभद्रा फिल्म के संवाद लेखन व गीत का दायित्व सौंपा लेकिन मोती बीए ने सिर्फ गीत लिखने का दायित्व लिया. सुभद्रा का एक गीत मशहूर हुआ— मेरे नैनो में जल भर आये, वे नहीं आये...फिर फिल्मिस्तान से जुड़ गये. भक्त ध्रुव के लिए तीन गीत लिखे. एक फिल्म साजन आयी, जिसमें मोती ने तीन गीत लिखे, जिनमें एक गीत बेहद मशहूर हुआ— तुम हमारे हो न हो...इस तरह 1948 का साल आया. तब दिलीप कुमार और कामिनी कौशल को लेकर किशोर साहू 'नदिया के पार' नाम से फिल्म बना रहे थे. उस फिल्म के गीत लिखने का प्रस्ताव मोतीबीए के पास आया. मोती बीए ने उस फिल्म के सारे गीत लिखे और सब के सब गीत भोजपुरी में.


यह एक असाधारण घटना थी. अभी भोजपुरी फिल्मों की शुरुआत नहीं हुई थी लेकिन भोजपुरी गीत हिंदी सिनेमा के जरिये बड़े परदे पर आने को तैयार हुआ. कठवा के नइया बनईहे रे मलहवा, नदिया के पार दे उतार... लोगों की जुबान पर चढ़ गया. इस फिल्म के सारे गीत मशहूर हुए. इसी फिल्म में एक पुरबी गीत था—सोने की मछरिया ले के, चली हो बजरिया, ओ संवरिया मोरे... यह भी बहुत मशहूर हुआ. शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी ने स्वर दिया. मोहम्मद रफी ने मोती बीए के गीतों को खूब स्वर दिया. सुरेखा हरण फिल्म के लिए मोती बीए ने ​गीत लिखा. उस फिल्म का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ— मारी गयो रे मेरे दिल पे कटारी. लता मंगेशकर ने स्वर दिया. ओ गोरी, ओ छोरी, कहां चली हो... जैसे गीत मोती बीए ने लिखे. रफी के स्वर में हवा तुम उनसे जा के कह दे, एक दिवाना आया है. तेरी सूरत पर मरनेवाला एक परवाना आया है... काफी मशहूर हुआ. इस तरह मोती बीए एक एक कर कई फिल्मों में गीत लिखते गये. किसी की याद, काफिला, अमर आशा, इंद्रासन, राम विवाह कुछ मशहूर फिल्में हुई.


1950 में मोतीबीए का मायानगरी से मोहभंग हुआ. इतने ही कम समय में उन्होंने करीब 80 फिल्मों में गीत लिखे. अपने गांव वापस लौट गये. गांव रहते हुए प्राध्यापकी करते रहे लेकिन गीतलेखन मन में रचा—बसा रहा. 1984—85 में, भोजपुरी फिल्म के निर्माताओं ने उनसे संपर्क किया. उन्होंने फिर से लिखना शुरू किया. भोजपुरी फिल्मों के गीत भी लिखे. गजब भइले रामा, चंपा चमेली, ठकुराईन आदि फिल्मों के लिए. गजब भइले रामा फिल्म का एक प्रसंग यह है कि इसके संगीतकार रवीेंद्र जैन थे. यह फिल्म रिलीज नहीं हो सकी लेकिन इसके गीत रिलीज हुए.सिर्फ रिलीज नहीं हुए बल्कि खूब लोकप्रिय हुए. इस फिल्म में एक गीत तुलसी विवाह का था—अंगनइया बीचे तुलसी लगइबो हरी... यह गांव गांव तक पहुंचा. तुलसी विवाह और तुलसी पूजा का आवश्यक गीत बन गया. इस फिल्म में एक गीत था— अईसन दुनिया,अईसन लोग, रामजी बनवले रहें ना. इस गीत को मोतीबीए के बेटे गानेवाले थे लेकिन संगीतकार रवींद्र जैन को इसके बोल इतने पसंद आये कि उन्होंने खुद ही इसे गाने का फैसला किया और गाये भी. इस गीत को जब रवींद्र जैन रिकार्ड कर रहे थे, तब वे 103 डिग्री बुखार से तप रहे थे लेकिन उन्हें यह गीत इतना पसंद था या इसे गाने की इतनी जल्दबाजी में थे कि महबूब स्टुडियो में रिकार्डिंग टाल नहीं सके.पांच घंटे तक रिकार्डिंग चली.


रवींद्र जैन मोतीबीए के गीतों का अलग से अलबम भी लाना चाहते थे लेकिन बाद में ऐसा हो नहीं सका.मोती बीए की खासियतें दूसरी थी. उन्होंने पहली बार भोजपुरी का गीत तो फिल्मों के लिए लिखा ही, पारंपरिक लोकगीतों—लोकधुनों का भी प्रयोग खूब किया, करवाया.कजरी,पुरबी,जोगिरा के तर्ज पर गीत लिखे. 1952 में एक फिल्म आयी थी—राजपूत. इस फिल्म में मोती बीए ने जोगिरा के तर्ज पर गीत लिखा,​ जिसे मोहम्मद रफी और शमशाद बेगम ने स्वर दिया. गीत का बोल था— हो लड़को धूम मचाओ, ढोलक को तेज बजाओ...यह गीत खूब मशहूर हुआ.कहते हैं कि मोतीबीए के गीतों में लोक इस तरह से समाहित होता था कि जब भी उनके गीत कहीं बजते थे तो लोग खड़े होकर सुनते थे.


यह सब तो फिल्मी दुनिया में उनकी धमक रही. साथ ही कविताई की दुनिया में भी मोती बीए उतने ही मशहूर हुए. आकाशवाणी,दूरदर्शन आदि से तो उनका काव्य पाठ होता ही था. उस समय प्रदीप,गोपाल सिंह नेपाली जैसे कवियों के साथ भी मंच साझा करते थे. मोतीबीए की कविताई की दुनिया विशाल रही. वे प्रेम और श्रृंगार से ज्यादा श्रम,सौंदर्य,सृष्टि और प्रकृति को रचते थे. उनकी कविताओं में आईल महुआबारी में बहार सजनी... सेमर के फुल... आदि मंचीय दुनिया में खूब लोक​प्रिय थे. मोतीबीए स्त्रियों के स्वर को बहुत ही मुखरता से उठाते थे.


हिंदी के शीर्ष कवि रामदरश मिश्र ने लिखा है कि एक बार वह मोती बीए और अन्य लोगों के साथ बैठे हुए थे. उसी समय कुछ लड़कियां पेड़ से अमरूद तोड़ने के लिए धमाचौकड़ी मचा रही थी.सामने लड़कों का हॉस्टल था. किसी ने लड़कियों पर टिप्पणी कि कैसी लड़कियां हैं, जिन्हें शर्म नहीं आ रही. लड़कों के सामने उछल कूद रही हैं. मोती बीए इस बात से नाराज हो गये. सिर्फ नाराज ही नहीं हुए, बल्कि भीड़ भी गये कि आपने लड़कियों पर टिप्पणी कैसे की. मोती बीए की लड़कियों या महिलाओं की प्रति इस संवेदना या लगाव को उनकी रचनाओं में भी देखा जा सकता है. वे अपनी रचनाओं में स्त्री को उसकी आजाद स्वर और आजादी देते हैं. उनका गीत बहुत मशहूर है— हम मारब नजरिया के बान, हमार केहू का करी. हम पंछी भरीला उड़ान हमार केहू का करी.



मोती बीए ऐसे ही थे. और अगर इन सबके बाद भोजपुरी साहित्य में उनके अवदान की बात करें तो एक नया और लंबा अध्याय शुरू होता है. मोतीबीए ने कालीदास के मेघदूत का भोजपुरी में अनुवाद किया. शेक्सपीयर के सॉनेट को उन्होंने भोजपुरी में अनुदित किया. अंग्रेजी के मशहूर नाटक 'लिंकन' को भोजपुरी में ढाला. जापानी हाइकू को भोजपुरी में लानेवाले वे पहले कवि हुए. यह मोतीबीए की रचनाक्षमता ही थी कि उन्होंने चार भाषाओं में 50 के करीब किताबें लिखीं. 1945 में ही जम्मू से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका गुलाब का एक मोती बीए पर विशेषांक के रूप में निकला. बाद में तो कई पत्रिकाओं ने उन पर विशेषांक प्रकाशित किये, जिनमें भोजपुरी की पत्रिका पांति,हिंदी पत्रिका सरयूधारा ने उन पर विशेषांक निकाला.और आखिरी में बात और. भोजपुरी संविधान की आठवीं अनुसूचि में नहीं है. साहित्य अकादमी की भाषा नहीं है लेकिन भोजपुरी में तीन ऐसे रचनाकार हुए, जिन्हें अकादमी पुरस्कार मिला. उनमें मोती बीए एक थे. मोती बीए 18 जनवरी 2009 को दुनिया से विदा हुए. तब गुमनामी में थे. लेकिन वह कहा करते थे कि मेरी जन्म​तिथि का तो पहा नहीं लेकिन मेरी मृत्यु की तिथि भी यादगार बनेगी. अभी गुमनामी में हूं लेकिन लोग मुझे याद करेंगे.

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