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वीर लड़ाका-प्रभु सिंह का नाम सुने हैं?

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निराला बिदेसिया

विश्व इतिहास में कई युद्ध चर्चित हैं. उनमें एक युऋ दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी साम्राज्य की सेना और मुट्ठी भर बोअरों के बीच का युद्ध है. 1899 के आखिर में यह युद्ध शुरू हुआ था. अंग्रेजी साम्राज्य, जिसमें सूर्यास्त नहीं होता था, उसकी विशाल और बहुदेशी सेना को कुछ बोअरों ने अपने देशप्रेम—देशभक्ति के दम पर पानी पीला दिया था. बोअर हार गये थे लेकिन उस हार में भी एक जीत ही थी. खैर, बोअर युद्ध पर बात फिर कभी. अभी बोअर युद्ध का हिंदुस्तानी, बिहारी कनेक्शन बताते हैं.

एक ओर लेडीस्मिथ की अंग्रेजी सेना थी, दूसरी ओर बोअर. अंग्रेजी सेना के साथ बिहार के आरा जिले के प्रभु सिंह नामक एक गिरमिटिया भारतीय भी थे. बोअर की लड़ाई के बाद प्रभु सिंह की वीरता और धीरता की कहानी उस समय काफी चरचे में रही थी. उनकी वीरता से सब चकित भी थे. हुआ यह था कि उस समय जनरल जूबर्ट की करीब 20 हजार सेना लेडीस्मिथ को घेरे हुए थी. वहां से नेटाल की राजधानी 150 किलोमीटर की दूरी पर रह गयी थी.

हालत गंभीर हो गई. इस युद्ध में चर्चित रहे जॉर्ज व्हाईट अपनी पलटन के साथ लेडीस्मिथ में घिरे पड़े थे. बोअरों की सेना के जनरल ने अंबुलवाना पहाड़ी पर तोपखाना जमा दिया था. वहां जो तोपें लगाई गई थी,उसका नाम था लॉंगटॉम. 48—48 सेर का एक—एक गोला उससे दागा जाता था. एक बार की फायरिंग से अंगरेजी सेना में हलकान मच जाता था. हालत खराब हो जाते थे.अंगरेजों ने बोरों में बालू—माटी आदि भरकर किलेबंदी की थी कि गोले से बचा जा सके लेकिन सवाल यह उठा कि यह हिम्मत कौन जुटायेगा कि वह बोरों के उपर खड़ा हो सके और उधर से गोला चले तो इत्तला कर सके ताकि सबलोग बचने के लिए छुप जाये. कौन अपनी जान की बाजी लगाकर ऐसा करेगा? किसी अंगरेज की हिम्मत न पड़ी. आखिर में प्रभु सिंह मैदान में आये. वह तैयार हुए कि अपनी प्राण की बाजी लगाकर वह यह काम करेंगे.

प्रभु सिंह बोरे—बालू की ढेर पर अंगरेजों का झंडा यूनियन जैक लेकर खड़े हो गये. वह पहाड़ी पर टकटकी लगाकर बोअरों की फौज की तरह देखते रहते. जैसे ही कोई तोप में गोला डालता, वह झंडा हिलाकर इशारा करते. जोर से चिल्लाते—बसोप—बसोप.प्रभु सिंह इशारा करते, सभी छुप जाते. कई बार गोले प्रभु सिंह के पास ही गिरे लेकिन उनका साहस नहीं टूटा. वह हिम्म्त के साथ डंटे रहे. खैर, इस बीच अंगरेजों ने लेडीस्मिथ में बोअरों को घेर लिया. लड़ाई खत्म हुई. अंगरेज विजयी हुए. इस वीरता के बदले अंगरेज सेनापति जॉर्ज व्हाईट ने प्रभु सिंह को धन्यवाद दिया, विलायत चले गये.

प्रभु सिंह को इसके बदले न तो कोई पदवी मिली, न पेंशन, न तमगा, न सम्मान. बस उनके गिरमिट की अवधि बख्श दी गयी, जहाज का टिकट देकर स्वदेश यानी भारत भेज दिया गया. लेडी कर्जन ने उनके लिए एक चोगा भेजा था, वह उन्हें मिला. जब उनकी विदाई हो रही थी तो गांधीजी भी उस सभा में थे. प्रभु सिंह वहां से लौटकर आरा आ गये. वह दाने—दाने को मोहताज हो गये. लेडी कर्जन ने जो चोगा दिया था, उसे ही ओढ़कर घूमते थे. ठंड से बचते थे. और फिर कब दुनिया से विदा हुए, किसी को पता भी नहीं चला.

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