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अब तो हिंदी साहित्य के बाजार में खोटे सिक्के ही चल रहे हैं

उपन्यासकार डॉ श्रवण गोस्वामी से बातचीत


आज श्रवण गोस्वामी के नहीं रहने की सूचना मिली.श्रवण गोस्वामी, हिंदी के साहित्यकार. नागपुरी के साहित्यकार. रांची में रहनिहारी थी उनकी.नागपुरी भाषा साहित्य पर डॉक्टरेट और शोध करनेवाले वे पहले व्यक्ति थे. उन्होंने रांची पर एक किताब लिखी. रांची तब और अब. यह उनका अपना संस्मरण था. बड़े ही रोचक ढंग से इस किताब को लिखा. रांची, जो अब राजधानी है, राजधानी बने भी 20 साल हो गये लेकिन उस शहर पर अब तक कोई मुकम्मल किताब नहीं आ सकी है.

श्रवण गोस्वामी के उस किताब को लेकर आकर्षण था. 2007-08 की बात है. साल, महीना ठीक से याद नहीं. उनके घर गया था. उनसे लंबी बात हुई थी. उसका एक हिस्सा तब प्रभात खबर में छपा भी था. तब प्रभात खबर में ही काम करता था. उसके बाद भी उनके पास कई बार जाना हुआ. हर बार लंबी बातचीत हुई. वह सब आडियो रिकार्ड फार्मेट में होगा लेकिन यह टेक्स्ट रूप में अभी मिला. आज वे दुनिया से विदा हुए हैं तो उस बातचीत का एक हिस्सा फिर से साझा कर रहा हूं.


- अब की साहित्यिक परंपरा में अपने नगर, अपने समुदाय आदि के बारे में लिखने की परंपरा खत्म-सी हो गयी है. ऐसे में अपने शहर रांची पर पुस्तक (रांची: तब और अब) लिखने का खयाल कैसे आया?

- मेरा जन्म रांची में ही हुआ. इस शहर को शुरू से देखा है. द्वितीय विश्वयुद्ध और एचइसी की स्थापना के बाद लगा कि यह शहर काफी तेजी से बदल रहा है. मल्टी कल्चरल दौर तभी शुरू हो गया था. इस बदलाव को मैं तभी करीब से महसूसने की कोशिश करता था. बाद में मुझे ऐसा लगा कि इसे लिपिबद्ध किया जाना चाहिए. लेकिन इसमें मैं एक बात जोड़ना चाहता हूं कि इसे इतिहास लेखन की तरह न लिया जाये बल्कि यह विशुद्ध रूप से मेरे अपने संस्मरण हैं.

- हिंदी का तेजी से विस्तार हो रहा है लेकिन साहित्य का विस्तार उस तरह से नहीं हो पा रहा.

- हिंदी साहित्य के सामने सबसे बड़ा संकट प्रकाशन का संकट है. प्रकाशक हेराफेरी करते हैं, लेखकों को वह महत्व नहीं मिलता, जिसके वे अधिकारी होते हैं, इस कारण से अन्य कई समस्याएं भी दिखती हैं. प्रकाशक पहले किसी भी पुस्तक का सजिल्द संस्करण प्रकाशित करते हैं. उसकी कीमत दोगुनी होती है. यह खरीदना सबके बस में नहीं होता. एक-दो साल बाद पेपरबैक संस्करण लेकर आते हैं. तब तक उसी पुस्तक विशेष को लेकर उत्साह ही ठंडा हो जाता है. यह भी एक गंभीर संकट है. दूसरी बात यह भी है कि हिंदी में अब भी उस तरह के पाठक नहीं हैं, जो किताबों को खरीद कर पढ़ें या यह उनके शौक-आदत में शामिल हो.

- सिर्फ प्रकाशकों या पाठकों को क्यों दोष दें. लेखक भी तो दोहराव में जीते हैं. यथार्थ व जमीन से कटते जा रहे हैं...

- हां यह सही है कि आज लेखकों का एक बड़ा खेमा है जो दिल्ली में बैठे-बैठे ही रांची या अन्य कस्बे की बात लिखता है. इससे एक किस्म की संकीर्णता पैदा होती है.

- आपके अनुसार हिंदी साहित्य के सामने सबसे बड़ा संकट क्या है अभी?

- हिंदी साहित्य के सामने एक बड़ा संकट तो मुझे यह दिखता है कि इसके नाम पर बाजार में अभी वही चल रहे हैं, जो खोटे हैं. यानी खोटे सिक्कों ने असली सिक्कों को बाहर कर दिया है. व्यक्ति पूजा की परंपरा का विकास तेजीसे हो रहा है. पूजा जाने वाला व्यक्ति किसी का भी नाम उछालकर सामने लाता रहता है. यह एक तरीके का कुचक्र है, जिसमें हिंदी साहित्य का विकास फंसा हुआ है. एक और बड़ा संकट यह भी है कि अलग-अलग मठों में, अलग संस्थाओं के नाम पर विभाजित होकर आखिरकार साहित्यकार हिंदी साहित्य का नुकसान ही कर रहे हैं.

- आपका यह कहना है कि हिंदी साहित्य में आलोचना कर्म भी पूरी तरह भटक गया है.

- नि:संदेह. कहां आलोचक रामदरश मिश्र, शैलेश मटियानी, विवेकी राय जैसे रचनाकारों को रेखांकित करते हैं. उनके नाम को आगे बढ़ाते हैं. अब हिंदी साहित्य भी मुंबईया फिल्म वाले स्टाइल में चल रहा है. जैसे फिल्म कलाकार बनने के लिए आपको मुंबई में रहना जरूरी है, वैसे ही साहित्यकार बनने के लिए दिल्ली में रहना होगा. दिल्ली अब सिर्फ प्रकाशकों ही नहीं साहित्यकारों की भी मंडी है.

- कई उपन्यास, शोधपत्र और अपने शहर के बारे में भी अहम पुस्तक लिखने के बाद अब आगे क्या योजना है.

- वर्षों से एक काम पेंडिंग में है. मैं ‘ हिंदी और नेहरू’ के संबंध पर एक कृति की रचना करने में लगा हुआ हूं. मेरा ऐसा मानना है कि हिंदी को इस स्थिति में पहुंचाने में और भाषायी संकीर्णता की स्थिति पैदा करने में नेहरू की भूमिका अहम रही थी. उन्होंने हिंदी के साथ न्याय नहीं किया था. फिलहाल उसी पर काम कर रहा हूं.

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